गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

एफ डी आई पर राजनैतिक दलो का खेल: मूल्य आधारित राजनीति को तिलांजली


एफ डी आई के मसले पर सभी पार्टीया राजनीति कर जनता को गुमराह कर रही है । जनता यह नहीं जानती कि खुदरा के क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के आने से फायदा होगा या शोषण । जनता को यह बात ईमानदारी से बताने वाला कोई नहीं है । राजनीतिक दल तो अपनी अपनी राग अलाप रहे है और जनता को मूर्ख बना रहे है । जनता को इसका गुणावगुण के आधार पर फर्क बताने वाला इस देश में कोई नहीं है। एकमात्र अपेक्षा मीडिया से हो सकती थी लेकिन वह भी राजनीतिक नेताओं की बात छापकर अपने कर्तव्य की इति श्री कर रहा है जबकि होना तो यह चाहिए कि मीडिया इन राजनैतिक नेताओं के विचार तो छापता ही साथ ही जनता को इसके गुण व दोष भी बताता लेकिन इतना चिन्तन कौन करें रही बात विशेषज्ञों की तो उनकी बात को मीडिया क्यों तव्वजों दें  हालाकि कुछ चैनलों ने बहस कराई लेकिन वह किसी सार्थक हल तक नहीं पहुच पाई जिसके आधार पर जनता इन राजनैतिक दलों की राजनीति समझ सकें

       यही भारतीय जनता पार्टी जो आज खुदरा में एफडीआई का विरोध कर रही है जो सत्ता में थी तो एफडीआई  को लागू करना चाहती थी लेकिन आज जब वह विपक्ष में तो इसे जनता विरोधी बता रही है । अब उससे कौन पूछे कि क्यों आप जनता को मूर्ख बना रहे है  जब देश की अस्मिता का सवाल है तो उस समय आप भी इसे लागू करने वाले थे क्या उस समय देश की अस्मिता बची रहती \ आज आप देश को विदेशी कम्पनियों के गिरवी रखने का आरोप कांग्रेस पर लगा रहे हैं ।  भाजपा 2002 में जब सत्ता में थी तब एफडीआई को पास कराना चाहती थी तब तत्कालीन विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने इसका विरोध किया था और यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था । उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के  2004 के घोषणा पत्र मे खुदरा व्यापार में एफडी आई की 100 प्रतिशत भागीदारी की बात की गई थी ।

       विडम्बना देखिए कि जिस कांग्रेस ने 2002 में एफडीआई का विरोध किया था वही कांग्रेस 2012 में इसे लागू कर रही है । आज काग्रेस को एफडीआई को लागू करने में फायदे नजर आ रहे है जबकि 2002 में उसे यह देश हित में नहीं लग रहा था ।  इसका तात्पर्य यह है कि सभी राजनैतिक दल अपने प्रस्तावों को पास कराने तक ही सीमित है उनका देश से या जनता से कोई लेनादेना नहीं है । देश की अस्मिता बचें या न बचें इन दलों को कोई फर्क नहीं पडता केवल अपना प्रस्ताव पारित कराना ही इनका ध्येय बन गया है । नैतिक मूल्यों का इतना पतन हो चुका है कि देश की अस्मिता किसी भी दल के लिए दूर की कौडी हो गई हैं । संख्या बल के आधार पर  वह gj प्रस्ताव पारित कराया जा रहा है जिसका दूरगामी परिणाम देश हित में हो या न हो इसकी किसी भी दल को कोई  फिक्र नहीं है । जबकि आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए कि सभी राजनैतिक दल पूरी इमानदारी से देश को बताए कि इस एफडीआई से क्या नुकसान है और क्या फायदे  फिर उसके आधार पर संसद में उस पर मंथन हो और संसद को लगे कि इससे देश को फायदा होगा रोजगार के साधन बढेगे किसानों  उपभोक्ताओं  का शोषण नहीं होगा तो ही उसे बिना किसी राजनैतिक दुभार्वना से पारित किया जावें लेकिन आज हो यह रहा है कि सत्तापक्ष किसी भी तरह से अपने द्वारा लाए गये प्रस्ताव को पारित कराना ही अपना मकसद समझने लगे है । संख्याबल के आधार पर हर उस प्रस्ताव को पारित कराया जा रहा है जिसके दूरगामी परिणाम चाहे कुछ भी रहे ।

       ऐसे में मीडिया व ऐसे विषयों पर विशेषज्ञों को आगे आकर जनता को सही और गलत का रास्ता बताना चाहिए ताकि ये जो राजनीतिक दल राजनीति कर रहे है उसको आम जनता जान सके । मीडिया का यह कतव्र्य है कि वे हर मसले पर जनता को निष्पक्षता से बताए कि राजनैतिक दल क्या कह रहे है और  वास्तवकिता क्या है  तब कहीं जनता इन राजनैतिक दलों का चरित्र जान सकेगी । हालाकि एफडीआई के मसले पर जनता ने सीधे प्रसारण में कई राजनैतिक दलों के चरित्र को  देख लिया है । जिसमें  प्रमुख दो दलों के अलावा कई अन्य दलों के चेहरे भी सामने आ गए है जिनकी कथनी और करनी में बहुंत ही फर्क हैं । समाजवादी पार्टी व  बहुजन समाज वादी पार्टी के नेताओं को जनता ने संसद में एफर्डीआइं का विरोध करते देखा लेकिन इन्ही पार्टीयों ने जानबूझ कर संसद से बर्हिगमन कर इसे संसद में पारित कराने का रास्ता साफ कर अपने दोहरे चरित्र का उदाहरण पेश किया । यदि वास्तव में ये दोनो दल एफडीआई के गुणावगुण के आधार पर इसका विरोध कर रहे हैं तो फिर उन्होने इसके पारित होने का रास्ता साफ क्यों किया \ क्या इसे नैतिक मूल्य आधारित राजनीति कहेगें\ ईमानदारी से देश हित में आपको मतदान में भाग लेना चाहिए था ताकि यदि एफडीआई देश हित का प्रस्ताव नहीं है तो उसे लागू करने में मदद नहीं करनी चाहिए था। जनता सब देख भी रही है और समझ भी रही है  मौका आने पर जनता चूकेगी भी नहीं । हालाकि हमारे देश की जनता अन्य विकसित देशों के नागरिकों की तरह जागरूक व सर्तक नहीं  हैं लेकिन राजनैतिक दलों के ऐसे चरित्रों से उसे जागरूक होने का मौका मिल रहा है । हालाकि जनता को जागरूक होने में  समय लगेगा और तब तक राजनैतिक दल इसका फायदा उठाकर संख्याबल के आधार पर अपनी पंसद के प्रस्ताव संसद में पारित करवाते रहेगे ।

       अमेरिका में सार्थक बहस के बाद राजनेता पूरी ईमानदारी से किसी भी प्रस्ताव को संसद में पारित करते है यदि उन्हे लगता है कि इससे देश हित प्रभावित होगा तो वे ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर अपनी मुहर नहीं लगाते जबकि हमारे यहां व्हिप जारी होता है और संख्याबल के आधार पर किसी भी प्रस्ताव को पारित करा लिया जाता है । ये कैसा खेल खेल रही है हमारी राजनीतिक पार्टीया \ जिनमे देश हित हो या न हो केवल पार्टी हित और व्हिप ही सर्वोपरि हे । जैसा कि भाजपा कह रही है एफडीआई से विदेशी कम्पनिया कब्जा जंमा लेगी  यहा के छोटै व्यापारी बर्बाद हो जाएगे किसान इन विदेशी कम्पनियों के चंगुल में फंस जाएगे  तो वह ही बताए कि  इतने नुकसान आपको नजर आ रहे है तो जब आप सत्ता में थे तो इसे क्यों लाना चाहते थे  क्या आप जनता को मूर्ख समझते है कि जब आप कोई प्रस्ताव लाए या अपने घोषणा पत्र में उसे शामिल करें तब तो वह फायदेमंद होगा और अन्य कोई लाएगा तो उसमें इतनी कमिया नजर आने लगी । ये कैसी राजनीति कर रहे है आप जनता के साथ \ भाजपा तो देश हित देखने वाली सबसे बडी पार्टी समझती है अपने आपकों फिर ये कैसा देश हित का उदाहरण पेश कर रही है

       मेरी राय में अब समय आ गया है कि राजनैतिक दलों के ऐसे चरित्र को देखते हुए मीडिया को अपनी पूरी ईमानदारी निष्पक्षता एवं जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए । उसे केवल राजनीतिक दलों के स्पोकमेन की तरह नहीं इसके साथ साथ हर उस प्रस्ताव के गुण दोषों को विषय विशेषज्ञों की राय को  जनता को दिखाना चाहिए जिसका असर इन प्रस्तावों के पारित होने या न होने से होने वाला है । हालाकि जनता उस पर कर कुछ नहीं सकेगी लेकिन उसमें जनता को उन राजनैंतक दलों के चरित्र का पता चल सकेगा जो उसे गुमराह कर रहे है और आगामी चुनावों मे उसे सही व गलत राजनैतिक दल की पहचान करने में आसानी होगी । जिससे लोकतंत्र मजबूत होगा न की राजनीतिक दल ।

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कोयला ब्लाक के आवंटन पर केग की रिर्पोट पर बवाल

कोयला ब्लाक के आवंटन पर केग की रिर्पोट पर बवाल

देश में अभी 2 जी घोटाले के बाद कोयला ब्लाकस् के आवंटन पर भ्रष्टाचार को लेकर बवाल मचा हुआ है। बीजेपी की मांग है कि केग की रिर्पोट में भ्रष्टृाचार का ख्लासा होने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि जिस समय की यह रिर्पोट है उस समय कोयला विभाग के मंत्री का कार्यभार स्वयं प्रधानमंत्री देख रहे थे इसलिए वे सीधे सीधे जिम्मेदार है और उन्हे पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। पिछले 7 दिनों से संसद का मानसून सत्र बिना एक दिन भी चले निकल गया है हर रोज संसद का सत्र शुरू होता है और हंगामे के कारण बिना किसी विधाई कार्य के समाप्त हो जाता है जिससे देश को प्रतिदिन करोडों स्पये का नुकसान हो रहा है।

प्रश्न यह है कि इन कोयला ब्लाकस् के आवंटन में हुए घोटाले के लिए जिम्मेदार कौन है  क्या वास्तव में घोटाला हुआ है और यदि हुआ है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है  न्यूज चैनलों पर राजनैतिक दलों की चर्चाए हो रही है सब अपने को पाक साफ बता रहे है और जनता को गुमराह कर रहे है। इसको समझने के लिए हमें वास्तव मे इन ब्लाकस् के आवंटन की प्रक्रिया को समझना होगा तभी आम जनता यह समझ सकेगी कि न्यूज चैनलों पर चल रही चर्चाओं में किस पार्टी के नेता जनता को मूर्ख बना रहे है दुर्भाग्य भी ऐसा है कि हमारे देश के न्यूज चैनल भी राजनैतिक नेताओं की बहस तो दिखा रहे है लेकिन जनता को कोल ब्लाकस् के आंवटन की प्रक्रिया नहीं बता रहे यदि वे इन बहस से पूर्व जनता को इसके आंवटन की प्रक्रिया बताकर फिर बहस को दिखाए तो आम जनता को इन नेताओं के सफेद झूठ को समझने का अवसर मिलेगा तथा जनता को मालूम हो सकेगा कि किस पार्टी के नेता जनता को मूर्ख बना रहे हैं।

 कोयला ब्लाकस आवंटन की प्रक्रिया -

  वास्तव में छोटे कोयला ब्लाकस के आवंटन का अधिकार तो राज्य सरकारों के पास है लेकिन यदि बडे ब्लाकस् आवंटन करने हो तो संबंधित राज्य सरकार को केन्द्र सरकार के कोयला मंत्रालय व पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति की जरूरत होती है उसके लिए संबधित राज्य सरकार को इसका औचित्य बताते हुए अपनी अभिशंषा केन्द्र सरकार को भेजनी पडती है जहा एक कमेटी राज्य सरकारों द्वारा प्राप्त इन अभिशषाआं पर विचार कर अपनी स्वीकृति जारी करती है इस कमेटी में संबंधित राज्य सरकार के मुख्य सचिव राज्य सरकार की ओर से अपने औचित्य या पक्ष को रखने के लिए उपस्थित रहते है। कमेटी की मुहर के बाद ही संबंधित फर्म को कोयला ब्लाकस् के आंवटन होते है। आंवटन की प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार को ब्लाकस् आवंटन के पूर्व जिस फर्म को ब्लाकस् आवंटन कराने होते है उनके साथ एमओयू करना होता है जिसके तहत वे समस्त शर्ते व अनुंबंध होते है जिनका पालन संबंधित फर्म को करना होता है संबंधित राज्य सरकारों का यह दायित्व होता है कि वह मौजूदा नियमों के परिपेक्ष्य में एमओयू करें। केन्द्र सरकार की कमेटी एमओयू की प्रति ब्लाकस् आवंटन का क्षेत्र जो कि राज्य सरकार ही अभिशंषित करती है फर्म को ब्लाकस् आंवटन के औचित्य व फर्म की आर्थिक स्थिति की जानकारी आदि केन्द्रीय कोल आवंटन समिति के समक्ष प्रस्तुत करती है तथा उस फर्म की तरफ से एमओयू होने के बाद उसकी तरफ से आवंटन कराती है। केन्द्रीय कमेटी किसी भी फर्म को कोल ब्लाकस् का आंवटन उस ही स्थिति में करती है जबकि संबंधित राज्य सरकार के साथ एमओयू हो गया हो तथा वह मौजूदा नियमों का पालन करती हो। केन्द्रीय कमेटी यह मानकर चलती है कि राज्य सरकार द्वारा एमओयू होने का तात्पर्य है कि संबंधित राज्य सरकार ने संबंधित फर्म से उसी स्थिति में एमओयू  किया है जबकि वह सभी निर्धारित योग्यताए पूरी करती हो यदि किसी राज्य सरकार ने किसी फर्म से एमओयू करते समय किसी भी नियम जो कि निर्धारित है उसकी अनदेखी कर किया है तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है न कि केन्द्रीय आवंटन समिति की। क्योंकि समिति यह मानकर चलती है कि कोई भh राज्य सरकार निर्धारित नियमों के विपरीत एमओयू नहीं करेगी। इसलिए एमओयू होने के बाद यह जांच सामान्यतः नही की जाती कि संबंधित फर्म इस आवंटन के योग्य है या नहीं ये देखना राज्य सरकार का काम है। हा यह अलग बात है कि यदि समिति के समक्ष ऐसी कोई शिकायत आती है जिसमे राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के विपरीत जाकर एमओयू किया गया हो तो केन्द्रीय आंवटन समिति उसकी जांच करा सकती है। अर्थात् केन्द्रीय आंवटन
समिति राज्य सरकारों द्वारा अभिशंषित फर्म को उसकी अभिशंषा अनुसार ब्लाकस् आवंटन कर देती है यह एक सामान्य प्रक्रिया के तहत होता है।

अब हम प्रक्रिया समझने के बाद आते है कि कैग ने रिर्पोट में क्या लिखा है

नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (केग) ने अपनी रिर्पोट में लिखा है कि छतीसगढ झारखण्ड मध्य प्रदेश राजस्थान बिहार महाराष्ट् सहित राज्यों में जो कोल ब्लाकस् आवंटित किये गए है उन्हे यदि नीलामी की प्रक्रिया अपनाकर आंवटित किया जाता तो अधिक राजस्व की प्राप्ति होती और उसने एक आधार दर मानकर यह अनुमान लगाया कि इस अवधि मे आंवटित 57 कोल ब्लाकस् से सरकार को इतना राजस्व मिल सकता था जो कि नहीं मिला जिसके कारण सरकार को 1-86 लाख करोड रूपये के राजस्व का नुकसान हुआ।

आइए अब समझते है कि क्या नियमों में कोल ब्लाकस् को नीलामी की प्रक्रिया द्वारा आवंटन का नियम था  1999&-2004 में राजग की सरकार केन्द्र में थी उस समय की प्रक्रिया नीलामी द्वारा कोल ब्लाकस् आवंटन की प्रक्रिया नहीं थीं जब 2004&2009 में केन्द्र में यूपीए की सरकार आई तो उसने कोल ब्लाक्स को नीलामी की प्रक्रिया से आवंटन करने का प्रस्ताव रखा जिसका संबंधित राज्य सरकारों ने विरोध किया उस समय छतीसगढ झारखण्ड मध्य प्रदेश राजस्थान बिहार महाराष्ट् आदि राज्यों में विरोधी दलों की सरकारें थी और चूंकि खनिज सम्पदा वाले राज्य नीलामी प्रक्रिया नहीं चाहते थे इसलिए ये प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया और आंवटन पूर्व की  प्रक्रिया से जारी रहे। 2009&2014 के यूपीए के दूसरे कार्यकाल में इन राज्यों में से कई में कांग्रेस की सरकारे आ गई इसलिए यूपीए सरकार ने इस टर्म में नीलामी प्रक्रिया के प्रस्ताव को पुनः नहीं लागू किया और पूर्व अनुरूप ही कोयला ब्लाकस् आवंटन होते रहे। केन्द्रीय आडिटर जनरल की रिर्पोट में यह बताया गया है कि यदि इन ब्लाकस् को नीलामी प्रक्रिया से आंवटित किया जाता तो ज्यादा राजस्व की प्राप्ति हो सकती थी। बीजेपी इसी मुद्दे को उछाल रही है कि केग ने अपनी रिर्पोट में इतना नुकसान बताया है चूंकि अभी कई राज्यों में उसकी सरकार नहीं है इसलिए वह बवाल मचा रही है। वह जानती है कि इसका राजनैतिक फायदा लिया जा सकता है। लेकिन यदि वास्तव में देखा जाए जो यूपीए-1 की सरकार के समय नीलामी की प्रक्रिया का बीजेपी शासित राज्यों ने ही विरोध किया था जिसके कारण यूपीए की सरकार ने नीलामी की प्रक्रिया को लागू नहीं किया था। देखा जाए तो इस नुकसान के लिए तो तत्कालीन बीजेपी/गैर काग्रेस शासित राज्यों की सरकारें जिम्मेदार है। आने वाले समय में तत्कालीन सरकारों के मुख्यमंत्रीयों के वे पत्र भी सामने आ सकते है जिसमें उन्होने इस प्रक्रिया का खुलकर विरोध किया है।

केग की रिर्पोट में 57 कोयला ब्लाकस् के बारे में बताते हुए कहा गया है कि यदि इन ब्लाकस् को नीलामी द्वारा बेचा जाता तो सरकार को 1-86 लाख करोड रूपये और राजस्व के रूप में मिल सकते थे । राजनीतिक दलों की राजनीति देखिए कि बीजेपी ने इन 57 ब्लाक्स से भी आगे बढकर अपनी रिर्पोट बना ली है उसने यूपीए सरकार के सारे कार्यकाल (दोना टर्म) 2004&2010 तक आंवटित कुल 142 कोयला ब्लाक्स की रिर्पोट तैयार कर इसे 10 लाख करोड तक पहुचा दिया है । 2004 से पूर्व चंकि केन्द्र में उसकी सरकार थी इसलिए उस अवधि को वह इसमें शामिल नहीं कर रही। इस राजनीति पर काग्रेसी कह रहे है कि 2004 से पूर्व के आंवटनों पर बीजेपी चुप क्यों है 1999&2004 के आंवटनों को बीजेपी क्यों नहीं शामिल कर रही 

इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनो ही पार्टीयां अपने अपने राजनैतिक फायदे के अनुसार ही बाते कर रहे है जनता को सच बताने का इरादा किसी का भी नहीं है । यदि दोनो ही पार्टीयां जनता के प्रति इ्र्रमानदार होती तो केवल केग रिर्पोट की अवधि पर ही अपना अपना पक्ष रखती । ये भी सच है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने सभी राजनैतिक पार्टीयों द्वारा अपने चहेते को लाभ देने के मकसद से जनता के पैसे को चूना लगाए जाने की ओर इशारा किया है । केग ने अपनी रिर्पोट में यह बताया है कि यदि नीलामी प्रक्रिया अपनाई जाती तो देश को ज्यादा राजस्व की प्राप्ति होती जो कि जन कल्याण के कार्यो पर खर्च की जा सकती थी।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

एफ डी आई पर बवाल -कितना उचित या अनुचित


देश मे एफडी आई पर भारी बवाल मचा हुआ है केन्द्र सरकार खुदरा व्यापार के लिए विदेशी कम्पनियो को भारत मे अपनी दुकाने खोलने की अनुमति देना चाहती है जबकि विपक्ष का व व्यापारियो का कहना है कि इससे देशी खुदरा व्यापारियो को नुकसान होगा । जनता का भी इस आधार पर यह कहना है कि यदि ऐसा होता है तो विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार करने की अनुमति नही दी जानी चाहिए जिनसे भारतीय ख्ुदरा व्यापारियों को कोई नुकसान हो ।

ये एक साधारण सोच है कि यदि देश के व्यापारियो को नुकसान हो तो इस कीमत पर विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार की अनुमति नही दी जानी चाहिए । लेकिन जब तक इस पर गंभीरता से विचार नही किया जाता तब तक इस बारे मे अपनी राय देना उचित नही है । फौरी तौर पर किसी विषय पर बिना गंभीरता से विचार किये गुमराह होना परिपक्वता नहीं कहा जा सकता है । आईये जानते है इसकी गहराई जिसके आधार पर हम अपनी विचारधारा का निर्माण कर निर्णय करे कि क्या वास्तव मे विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार की अनुमति दी जानी चाहिए अथवा नही ।

एफडीआई को समझने के लिए हम छोटा सा उदाहरण लेते है कि जैसे किसी मोहल्ले मे कोई छोटी छोटी दो  तीन दुकाने है मोहल्ले के लोग उन्ही दुकानो से अपनी आवश्यकता का सामान क्रय करते है । जिससे उन्हे बार बार बाजार नहीं जाना पडता ।इन दुकानो से दुकानदार अपने परिवार का पालन पोषण करते है । सरकार की नई नीति होती है कि ऐसी दुकानो के लिए एक बाजार विकसित किया जावे ताकि लोगो को अपनी आवश्यकता का सामान वहां से भी लेने का अवसर मिल सके । लेकिन गली मोहल्ले के दुकानदार संगठित होकर सरकार के इस निर्णय का विरोध करते है कि इससे हमारी दुकानदारी पर प्रभाव पडेगा और हम बेेरोजगार हो जाएगे । क्या लगता है आपको क्या ये सही है  अपने विवेक से अपने आपको इस प्रश्न का उत्तर दीजिये ।

क्या गली मोहल्ले की दुकाने वास्तव मे बंद हो जाएगी  बाजार विकसित हो जाने से क्या गली मोहल्ले मे चलने वाली दुकाने बंद हुई है क्या आपके आसपास कोई दुकान नहीं है जबकि आपके गांव या शहर में बाजार भी है । बस इसी मे विदेशी कम्पनियों के भारत में मॉल खोलने की चाबी छिपी है भारतीय उपभोक्ता इतना परिपक्व है कि वह अपनी आवश्यकता की वस्तुए वही से खरीदता है जहॉ से उसे सस्ती व अच्छी वस्तु मिलती है । जब 90 के दशक में माइक्रोसाफट आई टी के क्षेत्र मे आई तो उसका जबर्दस्त विरोध हुआ कहा ये गया कि इससे कई लोग बेरोजगार हो जाएगे लेकिन आज स्थिति यह है कि आई टी के क्षेत्र में देश के लाखो युवाओ को अच्छे रोजगार मिले हुए है इसी प्रकार जब पिज्जा हट मैकडॉनल केएफसी जैसी कम्पनियो को इजाजत दी गई तब भी जबर्दस्त विरोध हुआ और रेलिया निकाली गई तर्क ये दिया गया कि इन कम्पनियो के आने से भारत के ढाबे होटलो वाले बेरोजगार हो जाएगे । क्या ऐसा हुआ  एक भी ढाबा न तो बन्द हुआ और न ही इसके कोई दुष्परिणाम सामने आए आज पिज्जा हट मैकडॉनल  व केएफससी भी अपना व्यापार कर रही है और ढाबे भी वैसे ही चल रहे है । ढाबे के शौकीन लोग ढाबो मे आज भी जा रहे है तो पिज्जा हट मैकडॅानल केएफससी के शौकिन अपने शौक वहॉ जाकर पूरा कर रहे है ढाबे वाले भी कमा रहे है और पिज्जा हट मैकडॉनल केएफसी भी अपना बिजनेस कर रहे है ।

 हमारे देश में 125 करोड लोग रहते है क्या सभी सुपर मार्केट से ही अपनी आवश्यकता की वस्तुए क्रय करते है  हमारे देश में रिलायन्स फ्रेश विशाल मेगा मार्ट बिग बाजार जैसे कई विशाल स्टोर है  जिन शहरो में ऐसे विशाल स्टोर है वहॉ क्या खुदरा दुकाने बंद हो गई है  नही हुई ना  वहॉ ये मॉल भी अपना व्यापार कर रहे है और खुदरा व्यापारी भी उसी तरह अपना व्यापार कर रहे है जिस तरह वे इन विशाल स्टोर की स्थापना से पहले करते रहे है ।

भारत मे विदेशी खुदरा व्यापार के लिए जो कम्पनिया आने वाली है उनमे वाल मार्ट कारफूर टेस्को केयर फोर जैसी विश्व की खुदरा व्यापार मे अग्रणी कम्पनी भी है इन विदेशी कम्पनियो का विरोध करने वालो का तर्क है कि इन जैसी कम्पनिया पहले तो बाजार पर कब्जा जमाने के लिए लोगो को उचित मूल्य पर सामान उपलब्ध कराऐगी और थोक व्यापारियो से अच्छे दामो से वस्तुए क्रय करेगी जिससे खुदरा व्यापारियो को माल नही मिलेगा और यदि मिलेगा भी तो बढी हुई कीमत पर जिससे उन्हे नुकसान होगा और  जब बाजार पर इन कम्पनियों का कब्जा हो जाएगा तो फिर ये मनमानी कीमत वसूल करेगी । भारतीय लोगो को इस बात से डर लगंता है कि अगर वास्तव मे ऐसा हो गया तो उनका तो जीना दूभर हो जाएगा । उनका यह डर वाजिब भी है । लेकिन थोडा गंभीरता से विचार करना होगा कि हमारे देश के कितने प्रतिशत लोग इस विशाल स्टोर से अपनी आवश्यकता का सामान खरीदते है । आपको जानकारी होगी कि हमारे पंजाब प्रान्त के अमृतसर चन्डीगढ व जालन्धर शहरो मे वाल मार्ट के स्टोर है और भन्टिडा मे शीघ्र ही खुलने वाला है ।

क्या इन शहरो मे खुदरा बाजार नही चल रहा है जिस प्रकार से हौव्वा खडा किया जा रहा है उस हिसाब से तो पंजाब के इन तीन शहरो जहॉ कि विदेशी कम्पनी वाल मार्ट के शो रूम है वहॉ तो खुदरा व्यापारी अपनी दुकाने बंद कर चुके होगे और वे बेरोजगार हो गए होगे । लेकिन सच्चाई ये है कि वहॉ के खुदरा व्यापारी आज भी इतने ही खुशहाल है जितने कि इन शोरूम की स्थापना से पहले थे ।

यही नही उडीसा मे तो विदेशी कम्पनी के आने के बाद स्थिति यह है कि मछली व्यवसाय से जुडे लोग अच्छे दाम मिलने के कारण मछली खाने से भी परहेज करते है । क्योंकि उन्हे उसके अच्छे दाम मिल रहे है और उनकी आर्थिक स्थिति मे सुधार हो रहा है। इसका मतलब ये भी नही है कि वहॉ मछली मिलना ही बन्द हो गया है आज भी लोग स्थानीय लोगो से उसी दामो पर अपने भोजन के रूप में मछली ले रहे है अर्थात् भारतीय व्यापारी और उपभोक्ता इतना जागरूक है कि विदेशी कम्पनी को तो बढे हुए दामो पर मछली बेच रहा है और अपनी आवश्यकता की पूर्ति स्थानीय लोगो से जहॉ से उसे उचित मूल्य पर मछली मिल जाती है वहॉ से ले रहा है । विरोध करने वालो के हिसाब से तो पंजाब के अमृतसर चन्डीगढ व जालन्धर शहरो व उडीसा मे खुदरा व्यापार की दुकाने बन्द हो जानी चाहिए थी जबकि वहा विदेशी दुकानो के साथ साथ देशी खुदरा व्यवसाय भी चल रहा है सीधा सा हिसाब है कि चाहे कितनी भी बडी कम्पनी क्यों ना आ जाए वह भारत के 125 करोड लोगो की जरूरते पूरी नही कर सकती वे अपनी होने वाली खपत के अनुसार ही स्थानीय बाजार से अपना माल क्रय करेगी   इससे यह सि़द्ध होता है कि विशाल शो रूम की तडक फडक उन खास लोगो को ही प्रभावित करती है जिन्हे ऐसे मालो से अपना सामान खरीदने की आदत है और ऐसे लोगो की भारत मे तादाद बमुश्किल 5 या 10 प्रतिशत है  अर्थात् 90 प्रतिशत आबादी इन विशाल शो रूम की तरफ अपने कदम तभी बढाती है जब उन्हे स्थानीय बाजार से सस्ती दर पर व उचित वस्तु मिलने की जानकारी मिलती है ।

हमारे देश के 125 करोड देशवासी चाहे कितने ही वाल मार्ट कारफूर टेस्को केयर फोर जैसी कम्पनिया आ जाए उन्हे उसी समय तक ही सर माथे पर चढाएगी जब तक कि वह उनकी जेब पर भारी नही होगी । यदि उन्हे लगेगा कि इन शो रूमो पर उनकी आवश्यकता के सामान की कीमत ज्यादा वसूली जा रही है तो वह इन विशाल शो रूम की तरफ मुह भी नहीं करेगी । हॉ 10- 20 प्रतिशत लोग ऐसे भी होगे जिन्हे यह मार्ट भा भी जाएगे । आज भी भारतीय उपभोक्ता इतना परिपक्व है कि यदि उसे दो तीन वस्तुए खरीदनी हो तो वह पहले मार्केट का सर्वे करता है यह जानकारी लेता हे कि कौन सी वस्तु कहॉ सस्ती मिलती है और फिर वह अपनी खरीदने की प्लानिग करता है । आज भी गावो व शहरो मे लोग एक वस्तु कही से तो दूसरी वस्तु कहीं दूसरी जगह से खरीदते है कारण कि उन्हे लगता है कि जो वस्तु सही व सस्ती है वह तो वही से खरीदी जाए जहॉ कि उसके उचित दाम है ।

भारतीय बाजार पर विदेशी कम्पनियॉ कब्जा कर लेगी यह भय दिखाकर विदेशी कम्पनियो मे भारतीय युवाओ के लिए रोजगार के अवसर समाप्त करना उचित नही कहा जा सकता क्योकि जब ये विदेशी कम्पनिया आएगी तो उन्हे कर्मचारियो की जरूरत होगी और वे कर्मचारी भारतीय युवा होगे । रही बात 125 करोड के आबादी वाले देश की जरूरतो को पूरा करने की बात तो वो तो 40-50 कम्पनियां नही कर सकती है क्योकि जब देश के रिलायंस फ्रेश विशाल मेगा मार्ट व बिग बाजार जेसी मल्टी परपज कम्पनियां भी भारतीय बाजार का 5 प्रतिशत व्यापार भी अपने कब्जे मे नहीं कर सकी तो ये विशाल शो रूम की चमक दमक वाली कम्पनिया क्या भारतीय उपभोक्ता को अपने मायाजाल मे फसा पाएगी ।         क्योकि भारतीय उपभोक्ता अव्वल तो इन चमक दमक वाली दुकानो के आगे से ही नही गुजरना चाहता और मान भी लिया जाए तो अधिक से अधिक 25-30 प्रतिशत लोग ही इन दुकानो के ग्राहक बन सकेगे और बाकी के 70-75 प्रतिशत जनता अपनी जरूरते स्थानीय खुदरा व्यापारियो से ही पूर्ति करेगी जिनसे इन विशाल शो रूमो को तो व्यवसाय मिल जाएगा और ये मुनाफा कमाते हुए कार्य करते रहेगे लेकिन स्थानीय खुदरा व्यापारी भी अपना धंधा आसानी से चला सकेगे । जैसा कि पंजाब के तीन शहरो मे तथा उडीसा के मछली व्यवसाय से  ये विदेशी कम्पनियां अपना काम कर रही है और स्थानीय खुदरा व्यापारी भी अपनी दुकाने चला रहे है । अब उन आम भारतीय लोगो को तय करना है जिनका राजनीति से कोई लेना देना नही है तथा जो देश के विकास के बारे मे सोचते है  कि क्या एफडीआई पर किया जा रहा बवाल वास्तव मे उचित है या ये केवल राजनीतिक स्टंट है । कही इससे हमारे युवाओ के इन विदेशी कम्पनियो मे रोजगार के अवसर तो समाप्त नही हो जाएगे साथ ही देश को विदेशी मुद्रा का भी नुकसान तो नही होगा ।

शनिवार, 5 नवंबर 2011

पेट्ोल के दामो मे एक बार फिर बढोतरी -जनता मे भारी आक्रोश

 
पेट्ोल के दामों में एक बार फिर बढोतरी ने जनता एवं राजनीतिक दलो मे  आग लगा दी है जनता सडको पर है तो राजनीतिक दल इस बहाने यूपीए सरकार को धाराशायी करने मे जुट गए है । यूपीए के घटक तृणमूल कांग्रेस ने तो सरकार से अपना समर्थन वापस लेने तक की बात कर दी है । अभी पिछले महिने ही पेट्ोल के दामो में 3 रूपये 14 पैसे प्रति लीटर की बढोतरी की गई थी जिससे देश मे पेट्ोल के दाम 70 रू से 73 रू प्रति लीटर तक पहुंच गए थे । अब फिर 1 रू 82 पैसे प्रति लीटर की बढोतरी कर दी गर्इ्र है । जिससे पेट्ोल 72 से 74 रूपये प्रति लीटर तर पहुंच गया है ।

पेट्ोल के दामो मे बढोतरी का जो कारण तथा तर्क  बताया गया है वह यह है कि अन्तर्राष्टी्य बाजार में रूपये की कीमत घट गई है  सितम्बर 2011 में  एक डालर  के बदले भारतीय 47 रू 66 पैसे देने पडते थे जबकि अब एक डालर के बदले 49 रू 20 पैसे चुकाने पड रहे है अर्थात् एक डालर पर एक रू 56 पेसे ज्यादा भुगतान करना पड रहा है इस कारण तेल कम्पनियों को घाटा हो रहा था अतः पेट्ोल के दामों में सिर्फ एक रू 82 पैसे की ही बढोतरी की गई है । यहां यह उल्लेखनीय है कि तेल के दामो का भुगतान डालर मे किया जाता है । अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में तेल के भाव अभी भी 110 डालर प्रति बैरल ही है उसके दामों में बढोतरी नही हुई है लेकिन भारतीय रूपये का अवमूल्यन होने के कारण तेल कम्पनियों को ज्यादा भुगतान करना पड रहा है इसलिए तेल की कीमते बढाई गई है ऐसा तर्क दिया गया है ।

अगर इस तर्क के आधार पर तेल की कीमते बढाई गई है तो फिर मार्च 2009 में डालर अपने अधिकतम स्तर पर था जब एक डालर के बदले 51 रू 21 पैसे देने पडे थे क्या आपको मालूम है उस समय पेट्ोल के देश मे क्या भाव थे उस समय पेट्ोल के दाम 40 रू 62 पैसे प्रति लीटर थे । इस तर्क पर यदि पेट्ोल के दामो मे बढोतरी हो तो फिर 2009 मे पेट्ोल  40 रू 62 पैसे प्रति लीटर क्यो था । इस तरह के लचर कारण देकर तेल कम्पनियां शायद सरकार को गुमराह कर जनता को लूट रही है ।

सरकार को चाहिए कि वह तेल कम्पनियों पर पूरी निगरानी रखे । कम्पनिया  अपने लाभ को कम नही करना चाहती इसलिए जब भी अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में कच्चे तेल के भावों में बढोतरी होती है वह दाम बढा देती है और जब भी डालर के मुकाबले रूपया कमजोर होता है तो इस तर्क के आधार पर दाम बढा देती है अर्थात् वे अपने निर्धारित लाभ को किसी भी स्थिति में कम नही होने देना चाहती । ये तो वह बात हो गई कि चाहे जनता जाए भाड मे इन कम्पनियों को अपने लाभ से मतलब है वह कम नहीं होना चाहिए ऐसे में लोकतात्रिक सरकार का यह दायित्व हो जाता है कि वह यह देखे कि जनता जब चारो से मंहगाई की मार से दबी जा रही है तो इन कम्पनियों को अपने निश्चित लाभ को थोडा कम करने की सलाह देकर दाम बढाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए ताकि मंहगाई से त्रस्त जनता को सडको पर उतरने पर मजबूर न होना पडे ।

जून 2009 से पहले तक पेट्ोल के दाम निर्धारित करने का अधिकार सरकार को था लेकिन जून 2009 के बाद तेल कम्पनियों को अपने स्तर पर दाम निर्धारित करने की छूट दे दी गई तथा हर 15 दिनों में इसकी समीक्षा करने का निर्णय लिया गया । लेकिन सरकारी तंत्र मे कौन समीक्षा करे  इसमे व्यवस्था तो यह  है कि अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में तेल के भावो के आधार पर पेट्ोल डीजल के दामों में कमी बढोतरी की जाए । जब दाम बढे  तो उसी अनुरूप दामों बढोतरी की जावे तथा जब इसमें कमी हो तो उसी अनुरूप दामो मे कमी भी हो लेकिन आश्चर्य जनक बात है कि अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के दामो मे कमी हुई तो दामो मे उसी अनुरूप कमी नहीं की र्गइं लेकिन दामो मे बढोतरी होते ही तेल कम्पनियों से दामों में बढोतरी कर दी है । ये कैसी समीक्षा हुई । जनता को जब राहत मिलनी चाहिए तब तो न तो सरकारी समीक्षको ने जनता की पैरवी करते हुए तेल कम्पनियों से जनता को राहत दिलाई और न ही किसी राजनीतिक दल ने इस विषय को कभी उछाला । लेकिन जब अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल मे भावों मे इजाफा हुआ या डालर के मुकाबले रूपया कमजोर हुआ तो बिना देरी किये समीक्षको ने दाम बढाने की छूट दे दी

जब जून 2008 में अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अपने उच्चतम स्तर 140 डालर प्रति बैरल पर था तब भी पेट्ोल के भाव इतने नही थे उस समय हमारे देश मे पेट्ोल के दाम 50 रू 56 पेसे प्रति लीटर थे जबकि वर्तमान में अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के भाव 110 रू प्रति बैरल है तो पेट्ोल के दाम 72 से 74 रू प्रति लीटर हो गए है इन दामों मे केन्द्रीय एक्साइज केन्द्रीय टेक्स वेट राज्य टेक्स आदि अलग से है अर्थात् अलग राज्यो में टेक्स के हिसाब से पेट्ोल 73 से 75 रू प्रति लीटर तक हो सकता है ।

तेल कम्पनियों ने गत  13 सितम्बर 2011 की आधी रात से पेट्ोल के दामो 3 रू 14 पैसे प्रति लीटर की बढोतरी की थी आकडे बताते है कि उस समय भारतीय कम्पनियो को एक डालर के मुकाबले 49 रू 29 पैसे चुकाने पड रहे थे । तथा तेल का अन्तर्राष्ट्ीय भाव भी 110 डालर प्रति बैरल  पर ही स्थिर था । अभी नवम्बर मे  1 रू 82 पैसे प्रति लीटर की जो बढोतरी की गई है उसमे तेल कम्पनियों को एक डालर के मुकाबले 49 रू 20 पैसे ही चुकाने पड रहे है अर्थात् सितम्बर के मुकाबले तेल कम्पनियो को एक डालर के मुकाबले 09 पैसे कम चुकाने पड रहे है तो ऐसे में पेट्ोल के दाम  13 सितम्बर 2011 के स्तर से कम होने चाहिए जबकि तेल कम्पनियो ने डालर के दामों मे  बढोतरी का बहाना बनाकर पेट्ोल के दामो मे 1रू 82 पेसे प्रति लीटर की बढोतरी कर  जनता व सरकार दोनो को धोखा दिया है ।

एक तथ्य यह भी तेल कम्पनियों ने जून 2009 से पेट्ोल डीजल के दामो को बढाने की उन्हे छूट मिली है तब से लेकर अब तक सिर्फ एक बार पेट्ोल के दामो मे कमी की है जबकि हर बार दाम बढाए ही है । जिस समय सरकार ने तेल को दामों को निर्धारित करने का जिम्मा दिया गया उस समय देश मे पेट्ोल के दाम 40 रू 62 पैसे प्रति लीटर थे । तथा अन्तराष्ट्ीय बाजार मे तेल 71 डालर प्रति बैरल था। जुलाई 2009 में ही अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के भाव 71 से घटकर 62 डालर प्रति बैरल हुए तो भी तेल कम्पनियो ने पेट्ोल के दाम घटाने की बजाय 4 रू 05 पैसे प्रति लीटर बढा दिये अर्थात् पेट्ोल 44 रू 67 पैसे प्रति लीटर कर दिया गया जबकि उन्हे दामो कमी करनी चाहिए थी तेल कम्पनियों ने उस समय भी जनता की जेब काटी । उस समय की समीक्षको की टीम ने क्या आंखे बंद कर रखी थी जब तेल कम्पनियां जनता की जेव काट रही थी । अप्रेल 2010 तक अन्तराष्ट्ीय बाजार मे तेल के भाव 86 डालर प्रति बैरल तक पहुंचे तो तेल कम्पनियों ने भी दाम बढाए लेकिन मई 2010 मे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के भावों में फिर कमी आई और मई 2010 मे इसके भाव 74 डालर प्रति बैरल हो गए तो भारतीय तेल कम्पनियों ने पेट्ोल के दाम घटाने की बजाय पेट्ोल 1 रू 40 पैसे प्रति लीटर बढा दिये और जो पेट्ोल अप्रेल 2010 में जनता को 44 रू 47 पैसे प्रति लीटर मिल रहा था मई 2010 में अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के दाम घटकर 74 डालर प्रति लीटर रह जाने पर भी भारत की जनता को 1 रू 40 पैसे प्रति लीटर महगा करते हुए 45 रू 87 पैसे प्रति लीटर बेचा गया । इस प्रकार तेल कम्पनियों ने जनता की जेव काटने का सिलसिला जारी रखा और प्रति 15 दिन से समीक्षा करने की नीति कागजो मे ही दबी रह गई ।

मई 2010 से अप्रेल 2011 तक अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के भावो में बढोतरी रही जो 74डालर प्रति बैरल से बढते बढते अप्रेल 2011 में 122 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गर्इ्र इस समय तक तेल कम्पनियों ने तेल के भाव 58 रू 37 पैसे प्रति लीटर तक कर दिये थे । मई 2011 मे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के भाव गिरकर 112 डालर प्रति बैरल रह गए लेकिन तेल कम्पनियों ने फिर भी मई 2011 में पेट्ोल के दामाे मे 5 रू प्रति लीटर की बढोतरी कर दी जबकि 10 डालर प्रति बैरल की कमी होने के कारण पेट्ोल के दामों में बढोेतरी की बजाय कमी की जानी चाहिए थी यहा भी तेल कम्पनियो ने जमकर लाभ कमाया । अप्रेल 2011 मे जब अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल का भाव 122 डालर प्रति बैरल था तब जनता को पेट्ोल 58 रू 37 पैसे प्रति लीटर मिल रहा था जबकि वर्तमान मे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल की कीमत 12 डालर प्रति बैरल कम हो चुकी है तथा दाम 110 डालर प्रति बैरल है तो भी भारतीय जनता को पेट्ोल कम दामों की बजाय 10 रू 96 पैसे प्रति लीटर महगा मिल रहा है  तेल कम्पनियों का ये कैसा खेल चल रहा है और समीक्षा कमेटी कैसी समीक्षा कर तेल के दाम बढाने की अनुमति दे रही है  क्या ये मिली भगत से जनता को लूटने का खेल तो पर्दे के पीछे नहीं ख्ाला जा रहा ।

तेल कम्पनियां इस बार पेट्ोल के दाम बढाने की पीछे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे तेल के दाम बढने का कारण नही बता रही बल्कि तर्क ये दिया जा रहा है कि डालर के मुकाबले भारतीय रूपये का मूल्य कम हो जाने के कारण उनको अब ज्यादा भुगतान करना पड रहा है ।अब कम्पनियों को एक डालर के मुकाबले 49 रू 20 पैसे का भुगतान करना पड रहा है । जबकि अप्रेल 2011 मे उन्हे एक डालर के बदले 44 रू 40 पैसे का ही भुगतान करना पडता था  अर्थात् उन्हे एक डालर के बदले 4 रू 80 पैसे ज्यादा चुकाने पड रहे है जबकि तेल कम्पनिया अप्रेल 2011 से अब तक जनता से 10 रू 96 पैसे प्रति लीटर ज्यादा वसूल रही है । एक बैरल मे करीब 159 लीटर होते है अर्थात् तेल कम्पनियों को 159 लीटर तेल के बदले 49रू 20 पैसे प्रति डालर के हिसाब से 5412 रूपये अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में चुकाने पड रहे है जिसकी लागत  करीब 34 रू 03 पैसे प्रति लीटर आती है । इस पर परिवहन चार्ज एक्साइज ड्यूटी  केन्द्रीय कर वेट व राज्य का कर व अन्य शहरो मे यह स्थानीय कर व लेवी अतिरिक्त है । 

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

मेरे आलेख अन्ना टीम के राजनीति की ओर कदम पर राष्ट्ीय चैनल्स पर बहस


मित्रो 9 अक्टूबर 2011 को मैने एक आलेख लिखा था अपने ब्लाग और फेस बुक पर शीर्षक था अन्ना टीम के राजनीति की ओर कदम  जिसमे यह बताया गया था कि अन्ना टीम राजनीति की ओर बढ रही है उस समय शायद कयास लगा हो लेकिन अब मेरे उन विचारो मे लिए गए मुद्दो पर बहस शुरू हो गई है कई राष्ट्ीय चैनल अन्ना टीम के राजनीति मे जाने या न जाने के मुद्दे को लेकर बडी बहस शुरू कर चुके है लेकिन मित्रो मैने तो यह बहस आपके समक्ष 8 दिन पहले ही रख दी थी जिसमे मेरे कुछ मित्रो ने अपने सुझाव भी दिए तो कुछ मित्रो ने इस ओर ध्यान भी नही दिया । लेकिन कोई बात नही अब राष्ट्ीय न्यूज चैनल्स विशेषतः आईबीएन 7 व अन्य पर चल रही इस बहस को देखिए और मेरे आलेख को भी पढकर बताइएगा कि क्या मेरे इस आलेख मे उठाए गये मुद्दो पर ही न्यूज चैनल्स पर चर्चाए हो रही है या मुझे ही लगता है कि इस आलेख मे उठाए गये मुद्दो पर बहस हो रही है कही मुझे भ्रम तो नहीे हो रहा । आप मेरे सच्चे मित्र है तो मुझे बताइऐगा तो सही वरना मै तो मुगालते मे ही रहूगा  लेकिन इसके लिए आपको मेरा ये आलेख पढना पडेगा तभी आप ईमानदारी से अपनी राय दे सकेगे । आपकी राय मेरा मार्गदर्शन बनेगी ।

       खासकर उन मित्रो से मेरा विशेष आग्रह रहेगा जो सक्रिय है और अपने विचार फेस बुक या अन्य किसी मचों पर व्यक्त करते रहते है ।

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

अन्ना टीम के राजनीति की ओर कदम


अन्ना की टीम सामाजिक सरोकारो मे मिली सफलता के बाद अपने कदम राजनीति की ओर बढाने की कोशिश कर रही है । समाज मे बढ रहे भ्रष्ट्ाचार को मिटाने के प्रयासो के तहत अन्ना टीम को मिली भारी सफलता के बाद अन्ना टीम को यह लगने लगा है कि जनता का भारी समर्थन उसके साथ है उनकी टीम को यह दंभ हो गया है कि जिस तरह समाज में व्याप्त भ्रष्ट्ाचार को दूर करने मे उसे भारत की जनता को जो जन समर्थन मिला वह उसे राजनीतिक सफलता भी दिला सकता है । हांलाकि अन्ना टीम ने अभी तक पूरी तरह राजनीति मे आने की घोषणा तो नहीं की है लेकिन हिसार मे हो रहे लोकसभा चुनावों मे उसने कांग्रेस को हराने का आव्हान् कर राजनीति मे आने के संकेत दे दिए है ।

अन्ना टीम इस चुनाव मे सीधे तौर पर तो मैदान मे नहीं है लेकिन उसने सत्तारूढ कांग्रेस के पार्टी के उम्मीदवार को जनता से अपील कर एक प्रयोग करने का प्रयास किया है कि उनकी अपील को जनता कितनी तव्वजो देती है यदि इस अपील का व्यापक असर होता है और कांग्रेस का उम्मीदवार हार जाता है तो आगे रणनीति तय की जा सकती है । अन्ना टीम मे अरविन्द केजरीवाल  जैसे आई आई टी से निकले प्रतिभाशाली आई ए एस है तो किरण बेदी जैसी आईपीएस  रह चुकी अधिकारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता है दूसरी तरफ पूर्व न्यायाधीश व पूर्व कानून मंत्री  रह चुके पिता पुत्र की जोडी है ।

  कहना न होगा कि इस टीम मे महत्वाकांक्षी लोग है जो अपने बूते कुछ करना चाहते है । भ्रष्टाचार के विरूद्ध लडी गई लडाई मे मिले भारी जन समर्थन ने इस टीम की महत्वकांक्षाओं को बढा दिया है । लगता है इस टीम को इस आन्दोलन के बाद यह समझ मे आ गया है कि जन समर्थन अलग बात है और संसद मे अपने अनुसार कानून बनवाना अलग बात ं। इसीलिए अन्ना टीम ने यह तय कर लिया लगता है कि जन सर्मथन के साथ साथ अपनी बात मनवाने के लिए संसद मे अपने प्रतिनिधी भी होना जरूरी है और उसी रणनीति के तहत इस टीम ने पहले हरियाणा मे 13 अक्टूबर 2011 को हो रहे लोकसभा उप चुनावो में अपनी अपील का असर देखने के लिए सत्तारूढ काग्रेस पार्टी के उम्मीदवार को हराने की अपील कर अपना पहला राजनीतिक प्रयोग किया है । बडे सोच समझ के साथ जनता को यह नहीं बताया गया है कि वहा की जनता किस पार्टी के उम्मीदवार को हराए । ये जनता पर छोडा गया है कि वह किसी भी को भी जिताए लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी को हराए । और जो इसका कारण बताया जा रहा है  वह यह है कि सत्तारूढ कांग्रेस पार्टी जन लोकपाल बिल को लाने के प्रति गंभीर नहीं है ।

इसके पीछे कई हेतु छिपे हुए लगते है जिनमे एक तो यह कि अभी अन्ना टीम किसी भी राजनीतिक पार्टी के साथ जुडी नहीं है यदि किसी पार्टी उम्मीदवार को जिताने की अपील की जाताी हे तो इस टीम पर उस पार्टी से जुडे होने का आरोप लग सकता है इसके अलावा अगर उसकी अपील का व्यापक असर होता है तो देश की सभी बडी राजनीतिक पार्टीयां अन्ना टीम से जुडने को तैयार हो जाएगी जिससे अन्ना टीम को भविष्य मे यह निर्णय लेने का अवसर मिल जाएगा कि वह किस राजनीतिक पार्टी के साथ अपना गठजोड करें इसके अलावा दूसरा विकल्प यह रहेगा कि यदि हिसार उपचुनाव मे कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी की बडी हार हो जाती है तो वह अगले वर्ष 5 राज्यो मे होने वाले विधान सभा चुनावो मे अपना राजनीतिक दल बनाकर अपने उम्मीदवार खडे कर सकती है । इन दोनो विकल्पो के कारण ही अन्ना टीम ने किसी भी अन्य पार्टी के प्रत्याशी को जिताने की अपील जनता से नही की है सिर्फ जनता को काग्रेस के उम्मीदवार को हराने की अपील कर पत्ते अपने हाथ मे रखने का प्रयास किया गया है ताकि इस चुनाव नतीजे के आधार पर ही भावी योजना को अंजाम दिया जा सके ।

अन्ना टीम ने यूपीए सरकार पर दबाव बनाने के लिए शीतकालीन सत्र मे जन लोकपाल बिल पारित कराने की शर्त लगाई है क्योकि यह टीम जानती है कि सरकार के लिए शीतकालीन सत्र मे यह बिल पारित कराना टेढी खीर है अभी यह बिल संसद की स्थाई समिति के पास विचाराधीन है जिसमे सभी पार्टीयों के संासद है और यूपीए के अलावा दूसरे गठजोड यह नहीं चाहेगे कि यह बिल शीतकालीन सत्र मे पारित हो जाए इसलिए वे इसे स्थाई समिति मे ही रोकने का भरसक प्रयास करेगे ताकि सरकार की किरकिरी हो और अन्ना टीम  सरकार के लिए परेशानी पैदा करे । वे गठजोड नही चाहते कि सरकार और अन्ना टीम जनता मे वाहवाही ले जाए इसलिए वे इसे स्थाई समिति से आगे जाने ही नही देना चाहेगे । यदि सरकार ने येन केन प्रकारेण इसे  भरसक प्रयास कर शीतकालीन सत्र मे पेश कर करवा ही दिया तो संसद इसे पारित नहीं करेगी क्योकि किसी भी बिल को पारित करने के लिए संसद के बहुमत का होना जरूरी है और यूपीए सरकार कितने ही दलो की वैशाखियो पर टिकी है जो उसे ऐसा करने नहीं देगे । इस प्रकार विपक्ष अपनी योजना मे सफल हो सकता है ।

अन्ना टीम के नीति निर्धारक ये जानते है इसलिए उन्होने घोषणा कर दी है कि यदि सरकार ने शीतकालीन सत्र मे जन लोकपाल बिल को पारित नहीं किया तो आगामी साल 5 राज्यो मे होने वाले विधानसभा चुनावो मे वे कांगेस को हराने के लिए जी जान  लगा देगे । इसमे भी इस टीम ने यह घोणणा नही की है कि वह अपने उम्मीदवार उतारेगी या किसी दूसरे दल का समर्थन करेगी । ये भी इस टीम मे अपनी मुठ्ठी मे रखा है जो हिसार के उपचुनावो के  परिणामों के बाद खुलेगी । भाजपा मे भी अच्छे नीति निर्धारक है उन्होने भी भावी रणनीति के तहत अन्ना टीम को अपनी ओर से जन लोकपाल बिल का समर्थन  करने का पत्र सौप दिया है ताकि राजनीति करवट बदले तो वे यह कह सके कि हमारी पार्टी ने तो अन्ना टीम को कभी का समर्थन दे दिया । ताकि भविष्य मे यदि  जरूरत पड जाए तो अन्ना टीम का समर्थन हासिल किया जा सके । ये निश्चित सा लगता है कि अन्ना टीम राजनीति मे कदम रखेगी क्योकि उसके जो एजेडा है  उसमे चुने हुए सांसदो को वापस बुलाने का अधिकार जनता को देना आदि जैसे कई लोक लुभावन बाते है जिसे कोई राजनीतिक दल स्वीकार नहीं कर सकता । ऐसे मे इस टीम के पास अपने उम्मीदवार मैदान मे उतारने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है । इसलिए भाजपा जान गई है कि अन्ना टीम की भविष्य मे उसे कहीं न कहीं जरूरत पडने वाली है चाहे सरकार बनाने मे ही क्यो न पड जाए ।

सत्तारूढ कांग्रेस सरकार अभी अन्ना टीम को लेकर भावी रणनीतिक रूप से तैयार नहीं लगती । अभी तो वह अन्ना टीम से पार पाने के लिए जूझ रही है । जन लोकपाल बिल को शीतकालीन सत्र मे पारित करवाकर सत्तारूढ सरकार एक बार अन्ना टीम को मना सकती है लेकिन अन्ना टीम ने तो अपनी आगामी योजना पहले से ही घोषित कर दी है कि उसका अगला कदम चुने जन प्रतिनिधियो को वापस बुलाने का अधिकार मांगने का होगा । ऐसे मे किसी भी सत्तारूढ दल के लिए परेशानी ही होनी है । चाहे वह कांग्रेस गठबंधन की सरकार हो या चाहे अन्य गठबंधन की सरकार । अन्ना टीम सत्तारूढ सरकार के लिए परेशानी का सबब बनेगी ही ।

अन्ना टीम जानती है कि कोई भी सरकार यह आत्मघाती कदम नहीं उठा सकेगी इसलिए जनता को अपनी ओर मोडने तथा सत्ता के गलियारो का स्वाद चखने के लिए यह जरूरी है कि वह स्वयं अपने उम्मीदवार मैदान मे उतारे और इस एजेडा के सहारे उसकी वैतरणी पार होती भी लगती है । इसी योजना के तहत अन्ना ने घोषणा की है कि वह पूरे देश मे घूमकर अपनी टीम तैयार करेगे ओर ऐसे युवाओ को चुनाव मैदान मे उतारेगे जिन्हे वे परख लेगे । अर्थात् भावी योजना का खाका तैयार हो चुका है अन्ना टीम का । अब यदि 2014 के लोकसभा चुनावों मे अन्ना टीम को जनता ने पूर्ण समर्थन दे दिया तो सत्ता का स्वाद अन्ना टीम भी चख लेगी और ये बहुत ही मुमकिन है कि सत्ता मे आने के बाद अन्ना टीम भी अन्य दलो की तरह जनता से किये वादे भूल जाए क्योंकि सत्ता का नशा होता ही ऐसा है कि अच्छे अच्छो को अंधा बना देता है वे लोग जो जनता से वादा कर सत्तासीन होगे वो ही भूल जाऐगे कि उन्होने चुने हुए जन प्रतिनिधियो को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिलाने का वादा किया था । याद होगा आपको 1977 का दौर जब जनता ने कांग्रेस का सूपडा साफ कर दिया था लेकिन वो ही सरकार ढाई साल भी नहीं चल सकी थी। और यदि अन्ना टीम को 2014 के लोकसभा  चुनावों मे सरकार बनाने का अवसर नहीं मिलता है या स्पष्ट बहुमत नही मिलता है तो भी अन्ना टीम के महत्वकांक्षी लोगो को तो सत्ता सुख मिल ही जाएगा  क्या वे संसद मे उस बिल को पास करवा सकेगे ।

यदि वास्तव मे अन्ना टीम को जनता के साथ रहना है तो उसे सत्ता मे आने की योजना के स्वप्न नहीं देखने चाहिए  उन्हे केवल सामाजिक सरोकारो के लिए लडने वाली टीम के रूप मे ही रहकर जनता के साथ मिलकर उसे सरकार से जनता को उसके हक दिलाने का प्रयास करते रहना चाहिए चाहे सरकार किसी भी दल की क्यों न बने । तभी जनता उसके साथ बनी रहेगी और प्रतिष्ठा भी । अन्यथा अन्ना टीम ने जो प्रतिष्ठा जनता मे बनाई है उसे भी खोना पड सकता है  क्योकिं सत्ता के नशे ने लोकनायक जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन  उनके संघर्ष व उनके सत्ता के मोह त्याग को भी ढाई सालो मे ही भूला दिया था । जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन ने ही जनता पार्टी को सत्ता के गलियारो तक पहुंचाया था तथा सत्ता के मोह से दूर जय प्रकाश नारायण ने कोई भी पद नहीं लेकर अपने लोगो को एक अच्छे शासन देने की आश मे सत्ता की लगाम सौपी थी जिन्हे उनके अनुयायी ढाई वर्ष भी संभाल नहीं सके थे ।