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रविवार, 4 दिसंबर 2011

एफ डी आई पर बवाल -कितना उचित या अनुचित


देश मे एफडी आई पर भारी बवाल मचा हुआ है केन्द्र सरकार खुदरा व्यापार के लिए विदेशी कम्पनियो को भारत मे अपनी दुकाने खोलने की अनुमति देना चाहती है जबकि विपक्ष का व व्यापारियो का कहना है कि इससे देशी खुदरा व्यापारियो को नुकसान होगा । जनता का भी इस आधार पर यह कहना है कि यदि ऐसा होता है तो विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार करने की अनुमति नही दी जानी चाहिए जिनसे भारतीय ख्ुदरा व्यापारियों को कोई नुकसान हो ।

ये एक साधारण सोच है कि यदि देश के व्यापारियो को नुकसान हो तो इस कीमत पर विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार की अनुमति नही दी जानी चाहिए । लेकिन जब तक इस पर गंभीरता से विचार नही किया जाता तब तक इस बारे मे अपनी राय देना उचित नही है । फौरी तौर पर किसी विषय पर बिना गंभीरता से विचार किये गुमराह होना परिपक्वता नहीं कहा जा सकता है । आईये जानते है इसकी गहराई जिसके आधार पर हम अपनी विचारधारा का निर्माण कर निर्णय करे कि क्या वास्तव मे विदेशी कम्पनियो को खुदरा व्यापार की अनुमति दी जानी चाहिए अथवा नही ।

एफडीआई को समझने के लिए हम छोटा सा उदाहरण लेते है कि जैसे किसी मोहल्ले मे कोई छोटी छोटी दो  तीन दुकाने है मोहल्ले के लोग उन्ही दुकानो से अपनी आवश्यकता का सामान क्रय करते है । जिससे उन्हे बार बार बाजार नहीं जाना पडता ।इन दुकानो से दुकानदार अपने परिवार का पालन पोषण करते है । सरकार की नई नीति होती है कि ऐसी दुकानो के लिए एक बाजार विकसित किया जावे ताकि लोगो को अपनी आवश्यकता का सामान वहां से भी लेने का अवसर मिल सके । लेकिन गली मोहल्ले के दुकानदार संगठित होकर सरकार के इस निर्णय का विरोध करते है कि इससे हमारी दुकानदारी पर प्रभाव पडेगा और हम बेेरोजगार हो जाएगे । क्या लगता है आपको क्या ये सही है  अपने विवेक से अपने आपको इस प्रश्न का उत्तर दीजिये ।

क्या गली मोहल्ले की दुकाने वास्तव मे बंद हो जाएगी  बाजार विकसित हो जाने से क्या गली मोहल्ले मे चलने वाली दुकाने बंद हुई है क्या आपके आसपास कोई दुकान नहीं है जबकि आपके गांव या शहर में बाजार भी है । बस इसी मे विदेशी कम्पनियों के भारत में मॉल खोलने की चाबी छिपी है भारतीय उपभोक्ता इतना परिपक्व है कि वह अपनी आवश्यकता की वस्तुए वही से खरीदता है जहॉ से उसे सस्ती व अच्छी वस्तु मिलती है । जब 90 के दशक में माइक्रोसाफट आई टी के क्षेत्र मे आई तो उसका जबर्दस्त विरोध हुआ कहा ये गया कि इससे कई लोग बेरोजगार हो जाएगे लेकिन आज स्थिति यह है कि आई टी के क्षेत्र में देश के लाखो युवाओ को अच्छे रोजगार मिले हुए है इसी प्रकार जब पिज्जा हट मैकडॉनल केएफसी जैसी कम्पनियो को इजाजत दी गई तब भी जबर्दस्त विरोध हुआ और रेलिया निकाली गई तर्क ये दिया गया कि इन कम्पनियो के आने से भारत के ढाबे होटलो वाले बेरोजगार हो जाएगे । क्या ऐसा हुआ  एक भी ढाबा न तो बन्द हुआ और न ही इसके कोई दुष्परिणाम सामने आए आज पिज्जा हट मैकडॉनल  व केएफससी भी अपना व्यापार कर रही है और ढाबे भी वैसे ही चल रहे है । ढाबे के शौकीन लोग ढाबो मे आज भी जा रहे है तो पिज्जा हट मैकडॅानल केएफससी के शौकिन अपने शौक वहॉ जाकर पूरा कर रहे है ढाबे वाले भी कमा रहे है और पिज्जा हट मैकडॉनल केएफसी भी अपना बिजनेस कर रहे है ।

 हमारे देश में 125 करोड लोग रहते है क्या सभी सुपर मार्केट से ही अपनी आवश्यकता की वस्तुए क्रय करते है  हमारे देश में रिलायन्स फ्रेश विशाल मेगा मार्ट बिग बाजार जैसे कई विशाल स्टोर है  जिन शहरो में ऐसे विशाल स्टोर है वहॉ क्या खुदरा दुकाने बंद हो गई है  नही हुई ना  वहॉ ये मॉल भी अपना व्यापार कर रहे है और खुदरा व्यापारी भी उसी तरह अपना व्यापार कर रहे है जिस तरह वे इन विशाल स्टोर की स्थापना से पहले करते रहे है ।

भारत मे विदेशी खुदरा व्यापार के लिए जो कम्पनिया आने वाली है उनमे वाल मार्ट कारफूर टेस्को केयर फोर जैसी विश्व की खुदरा व्यापार मे अग्रणी कम्पनी भी है इन विदेशी कम्पनियो का विरोध करने वालो का तर्क है कि इन जैसी कम्पनिया पहले तो बाजार पर कब्जा जमाने के लिए लोगो को उचित मूल्य पर सामान उपलब्ध कराऐगी और थोक व्यापारियो से अच्छे दामो से वस्तुए क्रय करेगी जिससे खुदरा व्यापारियो को माल नही मिलेगा और यदि मिलेगा भी तो बढी हुई कीमत पर जिससे उन्हे नुकसान होगा और  जब बाजार पर इन कम्पनियों का कब्जा हो जाएगा तो फिर ये मनमानी कीमत वसूल करेगी । भारतीय लोगो को इस बात से डर लगंता है कि अगर वास्तव मे ऐसा हो गया तो उनका तो जीना दूभर हो जाएगा । उनका यह डर वाजिब भी है । लेकिन थोडा गंभीरता से विचार करना होगा कि हमारे देश के कितने प्रतिशत लोग इस विशाल स्टोर से अपनी आवश्यकता का सामान खरीदते है । आपको जानकारी होगी कि हमारे पंजाब प्रान्त के अमृतसर चन्डीगढ व जालन्धर शहरो मे वाल मार्ट के स्टोर है और भन्टिडा मे शीघ्र ही खुलने वाला है ।

क्या इन शहरो मे खुदरा बाजार नही चल रहा है जिस प्रकार से हौव्वा खडा किया जा रहा है उस हिसाब से तो पंजाब के इन तीन शहरो जहॉ कि विदेशी कम्पनी वाल मार्ट के शो रूम है वहॉ तो खुदरा व्यापारी अपनी दुकाने बंद कर चुके होगे और वे बेरोजगार हो गए होगे । लेकिन सच्चाई ये है कि वहॉ के खुदरा व्यापारी आज भी इतने ही खुशहाल है जितने कि इन शोरूम की स्थापना से पहले थे ।

यही नही उडीसा मे तो विदेशी कम्पनी के आने के बाद स्थिति यह है कि मछली व्यवसाय से जुडे लोग अच्छे दाम मिलने के कारण मछली खाने से भी परहेज करते है । क्योंकि उन्हे उसके अच्छे दाम मिल रहे है और उनकी आर्थिक स्थिति मे सुधार हो रहा है। इसका मतलब ये भी नही है कि वहॉ मछली मिलना ही बन्द हो गया है आज भी लोग स्थानीय लोगो से उसी दामो पर अपने भोजन के रूप में मछली ले रहे है अर्थात् भारतीय व्यापारी और उपभोक्ता इतना जागरूक है कि विदेशी कम्पनी को तो बढे हुए दामो पर मछली बेच रहा है और अपनी आवश्यकता की पूर्ति स्थानीय लोगो से जहॉ से उसे उचित मूल्य पर मछली मिल जाती है वहॉ से ले रहा है । विरोध करने वालो के हिसाब से तो पंजाब के अमृतसर चन्डीगढ व जालन्धर शहरो व उडीसा मे खुदरा व्यापार की दुकाने बन्द हो जानी चाहिए थी जबकि वहा विदेशी दुकानो के साथ साथ देशी खुदरा व्यवसाय भी चल रहा है सीधा सा हिसाब है कि चाहे कितनी भी बडी कम्पनी क्यों ना आ जाए वह भारत के 125 करोड लोगो की जरूरते पूरी नही कर सकती वे अपनी होने वाली खपत के अनुसार ही स्थानीय बाजार से अपना माल क्रय करेगी   इससे यह सि़द्ध होता है कि विशाल शो रूम की तडक फडक उन खास लोगो को ही प्रभावित करती है जिन्हे ऐसे मालो से अपना सामान खरीदने की आदत है और ऐसे लोगो की भारत मे तादाद बमुश्किल 5 या 10 प्रतिशत है  अर्थात् 90 प्रतिशत आबादी इन विशाल शो रूम की तरफ अपने कदम तभी बढाती है जब उन्हे स्थानीय बाजार से सस्ती दर पर व उचित वस्तु मिलने की जानकारी मिलती है ।

हमारे देश के 125 करोड देशवासी चाहे कितने ही वाल मार्ट कारफूर टेस्को केयर फोर जैसी कम्पनिया आ जाए उन्हे उसी समय तक ही सर माथे पर चढाएगी जब तक कि वह उनकी जेब पर भारी नही होगी । यदि उन्हे लगेगा कि इन शो रूमो पर उनकी आवश्यकता के सामान की कीमत ज्यादा वसूली जा रही है तो वह इन विशाल शो रूम की तरफ मुह भी नहीं करेगी । हॉ 10- 20 प्रतिशत लोग ऐसे भी होगे जिन्हे यह मार्ट भा भी जाएगे । आज भी भारतीय उपभोक्ता इतना परिपक्व है कि यदि उसे दो तीन वस्तुए खरीदनी हो तो वह पहले मार्केट का सर्वे करता है यह जानकारी लेता हे कि कौन सी वस्तु कहॉ सस्ती मिलती है और फिर वह अपनी खरीदने की प्लानिग करता है । आज भी गावो व शहरो मे लोग एक वस्तु कही से तो दूसरी वस्तु कहीं दूसरी जगह से खरीदते है कारण कि उन्हे लगता है कि जो वस्तु सही व सस्ती है वह तो वही से खरीदी जाए जहॉ कि उसके उचित दाम है ।

भारतीय बाजार पर विदेशी कम्पनियॉ कब्जा कर लेगी यह भय दिखाकर विदेशी कम्पनियो मे भारतीय युवाओ के लिए रोजगार के अवसर समाप्त करना उचित नही कहा जा सकता क्योकि जब ये विदेशी कम्पनिया आएगी तो उन्हे कर्मचारियो की जरूरत होगी और वे कर्मचारी भारतीय युवा होगे । रही बात 125 करोड के आबादी वाले देश की जरूरतो को पूरा करने की बात तो वो तो 40-50 कम्पनियां नही कर सकती है क्योकि जब देश के रिलायंस फ्रेश विशाल मेगा मार्ट व बिग बाजार जेसी मल्टी परपज कम्पनियां भी भारतीय बाजार का 5 प्रतिशत व्यापार भी अपने कब्जे मे नहीं कर सकी तो ये विशाल शो रूम की चमक दमक वाली कम्पनिया क्या भारतीय उपभोक्ता को अपने मायाजाल मे फसा पाएगी ।         क्योकि भारतीय उपभोक्ता अव्वल तो इन चमक दमक वाली दुकानो के आगे से ही नही गुजरना चाहता और मान भी लिया जाए तो अधिक से अधिक 25-30 प्रतिशत लोग ही इन दुकानो के ग्राहक बन सकेगे और बाकी के 70-75 प्रतिशत जनता अपनी जरूरते स्थानीय खुदरा व्यापारियो से ही पूर्ति करेगी जिनसे इन विशाल शो रूमो को तो व्यवसाय मिल जाएगा और ये मुनाफा कमाते हुए कार्य करते रहेगे लेकिन स्थानीय खुदरा व्यापारी भी अपना धंधा आसानी से चला सकेगे । जैसा कि पंजाब के तीन शहरो मे तथा उडीसा के मछली व्यवसाय से  ये विदेशी कम्पनियां अपना काम कर रही है और स्थानीय खुदरा व्यापारी भी अपनी दुकाने चला रहे है । अब उन आम भारतीय लोगो को तय करना है जिनका राजनीति से कोई लेना देना नही है तथा जो देश के विकास के बारे मे सोचते है  कि क्या एफडीआई पर किया जा रहा बवाल वास्तव मे उचित है या ये केवल राजनीतिक स्टंट है । कही इससे हमारे युवाओ के इन विदेशी कम्पनियो मे रोजगार के अवसर तो समाप्त नही हो जाएगे साथ ही देश को विदेशी मुद्रा का भी नुकसान तो नही होगा ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. शशांक शेखर koi baat nahi.....bhagyawadi bhartiye bhul jate hain ki jo bhi aaj tak mila hai wo west se hi mila....aur fdi aane se asar to padega lekin positive.....virodh to bas politics hai...ek puri party hi inhi samooh ka hai....

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  2. शशांक शेखर koi baat nahi.....bhagyawadi bhartiye bhul jate hain ki jo bhi aaj tak mila hai wo west se hi mila....aur fdi aane se asar to padega lekin positive.....virodh to bas politics hai...ek puri party hi inhi samooh ka hai....
    35 मिनट पहले · पसंद.

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