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बुधवार, 21 सितंबर 2011

विद्यालयो का समय साढे सात घन्टे किया जाना बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से कितना उचित


 राजस्थान मे विद्यालयो का समय आगामी 1 अक्टूबर 2011 से सुबह साढे आठ बजे से शाम 4 बजे तक किया जा रहा है । शिक्षा का अधिकार कानून की व्यवस्था अनुसार ऐसा किया जा रहा है ऐसा सरकार का कहना है । शिक्षा में इस तरह के प्रावधानो को लाने का तात्पर्य यह है कि या तो हमारे नीति निर्धारको को  बाल मनोविज्ञान का भान नही है या ये लोग जान बूझकर बाल मनो विज्ञान की अनदेखी कर रहे है ।

       विद्यालयो का समय बढाने के पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि सामान्य छात्रो को तो विद्यालयो मे हमेशा वाले समय ही रहना होगा लेकिन जिन छात्रो ने इस वर्ष घर मे रहकर पढने बाबत जानकारी देकर प्रवेश लिया है अथवा जो छात्र कमजोर है उनको इस अतिरिक्त समय मे पढाया जायेगा । यानि अतिरिक्त कालांश देकर उन्हे इस लायक बनाने का प्रयास  किया जाएगा कि वे सामान्य छात्रो के स्तर तक आ जाए । देखने व सुनने मे यह बहुत ही अच्छी योजना दिखती है लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे बाल मनौविज्ञान के विपरीत ही कहा जाएगा।

क्या कहता है बाल मन

       बाल मनो विज्ञान कहता है कि बालक के सीखने की प्रक्रिया स्वाभाविक एवं मनोरंजक दायी होनी चाहिए । जब बालक का मन हो तभी उसे पढाया जावे तो अधिगम आसान होता है । बालक खेल खेल मे ज्यादा सरलता से सीखता है लेकिन उसे यदि यही अधिगम की प्रक्रिया जेल लगने लगे या उबाउ लगने लगे तो फिर वहां अधिगम किसी भी परिस्थिति में नही हो सकता है । सरकार का ये तर्क कि कमजोर बालको को अतिरिक्त समय पढाया जाकर उन्हे सामान्य बालको के स्तर तक लाने के लिए ऐसा किया जा रहा है  बाल मनो विज्ञान के मानदण्डो के विपरीत है । एक कमजोर छात्र को लगातार साढे 7 घन्टे विद्यालय मे रोक कर उसे सामान्य बालक के स्तर तक कैसे लाया जा सकता है । वैसे भी कमजोर बालक का मानसिक स्तर  सामान्य बालक के मानसिक स्तर से कम होता है उसकी एकाग्रता इतने अधिक समय तक किसी भी स्तर मे नहीं बनी रह सकती । जब किसी बालक की एकाग्रता सामान्य बालक से भी कम हो और उसे सामान्य बालक से भी अधिक समय तक एकाग्र करने का प्रयास किया जावे तो उसका क्या परिणाम होता है शायद हमारे शिक्षा विद् या शिक्षा का अधिकार कानून मे ऐसा प्रावधान करने वाले नही जानते । ऐसी स्थिति मे बाल मन पर इसका विपरीत असर पडता है या फिर बालक स्कूल से कतराने लगता है उसे स्कूल जेल जैसी व उबाउ लगने लगती  है और वह स्कूल से भागने या आने से कतराने  लगता है ।

       बालक को स्वाभाविक तरीके से कराया गया अधिगम ही सरल सरस व प्रभावी हो सकता है । यदि उसे अन्य विधार्थियो से अलग रखकर अधिगम कराने का प्रयास किया जाता है तो उसके अधिगम की गति बढने की बजाय घट सकती है या फिर वह इतना कुठित हो सकता है कि वह शिक्षण से मुंह ही मोड ले शिक्षा मे ऐसी व्यवस्था करने वाले स्वयं एक प्रयोग अपने बालक पर करके देखे और उसके बाद उसके परिणामों को देखे तो उनको यह बात आसानी से समझ मे आ सकेगी कि यदि एक सामान्य बालक या कुशाग्र बालक को भी उसकी इच्छा के विपरीत सामान्य समय से अतिरिक्त रोक कर अधिगम कराया जाए तो उसके सीखने की गति पर विपरीत प्रभाव पडेगा वह सामान्य परिस्थितियो की अपेक्षा धीरे धीरे कम एकाग्र होगा और एक परिस्थिति ऐसी आएगी कि उसका अधिगम सामान्य से भी कम अथवा उसके स्वयं के पूर्व के स्तर से भी कम होने लगेगा । यह मनोविज्ञान कहता है । यानि सामान्य परिस्थितियो का अधिगम अधिक प्रभावी एवं फलदायक होता है जबकि असामान्य परिस्थितियां बालक के मन पर बोझ का काम करती है जो बालक के मन मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव डालती है । वर्तमान बढाया जा रहा समय एक बालक के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालेगा । उसे अतिरिक्त समय मे आना दूसरे बालको से अलग करेगा । हालांकि यहा उद्देश्य उसे सामान्य बालको के स्तर तक लाना है लेकिन उसे जल्दी शाला बुलाना या शाला समय के बाद रोकना उसकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करेगा । उस बालक को लगेगा कि  उसे अन्य बालको से अलग रखा जा रहा है जिसके कारण उसे विद्यालय जेल जैसा या उबाउ स्थान होने का आभास देगा जो उसे अपने स्वाभाविक मानसिक स्तर से भी नीचे ले सकता है । इसका प्रभाव ये होगा कि या तो ऐसे बालक विद्यालय आना छोड देगे अथवा उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर होने लगेगी ।

       इसके अलावा जब किसी बालक को विद्यालय मे साढे 7 घन्टे रोका जाएगा तो उसे अतिरिक्त उर्जा की जरूरत होगी लेकिन इसके लिए कोई व्यवस्था नही की गई है सामान्यतः बालक को 3 से 4 घन्टे के बाद भूख का अहसास होने लगता है । सुबह साढे 8 बजे शाला आने वाला बालक अपने घर से 15 मिनट पूर्व तो रवाना होगा ही और यदि उसे शाम 4 बजे तक रोका जाता है तो इस बीच उसे उर्जा प्राप्त करने के लिए  दो बार खाने की तलब होगी । ऐसे मे विद्यालयो मे क्या कोई दूसरी व्यवस्था की गई है ।  एक समय तो मिड डे मील की व्यवस्था है लेकिन दूसरे अतिरिक्त समय मे बालको को क्या पौष्टिक आहार दिया जाएगा ये अभी तय नहीं है ।

       राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियां भी अन्य राज्यो से अलग है यहां सर्दियो मे अधिक सर्दी और गर्मियो मे सुबह से ही सूर्य अपनी प्रचण्डता दिखाने लगता है । सर्दियों में सुबह 7 बजे तक सूर्य के दर्शन तक नहीं होते । कोहरा व ठंड इतनी अधिक होती है कि बालक के लिए  वर्तमान सर्दियो के साढे दस बजे के समय मे भी आना दूभर होता है तो क्या वह नये समय साढे आठ बजे विद्यालय पहुच सकेगा । जो कि प्रातः साढे 8 बजे का होने वाला है । इसी प्रकार नये समय के अनुसार गर्मियो मे यह समय साढे 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक होगा । राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी है कि गर्मियों मे सूर्य अपनी प्रचण्डता सुबह 10 बजे बाद ही दिखाने लगता है पिछले कई सालो से सरकार को इसी कारण विद्यालयो का समय 11 बजे तक करना पडा है फिर भी पिछले अनुभवो से कोई सीख नहीं लेते हुए नए शिक्षा के अधिकार की आड मे गर्मियो मे यह समय सुबह साढे सात से दोपहर 3 बजे तक रखा गया है । लगता है उच्च पदो पर ऐसा  निर्धारण करने वाले हमारे अधिकारी व नीति निर्धारक घटित हो चुकी  परिस्थितियो से भी कोई अनुभव नहीं लेते । तभी अभी तो शिक्षक समुदाय विरोध में उतरा है और जब व्यवहार मे अपने बालको पर मानसिक दबाव जनता महसूस करेगी तो वह भी भविष्य मे इसका विरोध कर सकती है ।

       सरकार विद्यालयो का समय बढाकर शिक्षको तो साढे 7 घन्टे तक शालाओ मे रोक सकती है लेकिन बालको को रोक सकेगी इसमे सन्देह दिखाई देता है । वर्तमान स्थिति ये है कि साढे 5 घन्टे के विद्यालय समय मे भी अभिभावक अपने बच्चो को खेती के समय मे विद्यालय नहीं भेजते तो फिर साढे 7 घन्टे का समय होने पर तो शायद ही वे अपने बच्चो को स्कूलो मे भेजे । क्योकि पूरा दिन तो बच्चो का स्कूलो मे ही बितने वाला है ऐसे मे बच्चो की स्कूलो मे उपस्थिति कम ही रहेगी । फसलो के पकने के समय अभिवावक बच्चो को खेत की निगरानी के लिए रोक लेते है और स्वयं बाजार आदि मे अपने अन्य कार्यो को निपटाना चाहते है क्योकि फसलो की कटाई के समय उनके अन्य काम होना मुश्किल होते है अतः वे फसल के पकने व कटाई होने के बीच अपने अन्य घरेलू काम निपटाना चाहते है ऐसे मे फसल के पकने तक उनकी रखवाली का काम वे अपने बच्चो से कराना चाहते है और यही कारण है कि यदि आकलन किया जावे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि फसलो के पकने की अवधि मे स्कूलो मे छात्रो की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रहती है ।

 गम्भीर चिन्तन करने योग्य है कि क्या ऐसे मे बढा हुआ समय बच्चो व अभिभावको के लिए उचित रहेगा । गर्मियो मे राजस्थान मे यह स्थिति रहती है कि स्कूलों में पीने के पानी का अभाव रहता है इसके अलावा बच्चो को प्रचण्ड गर्मी के कारण आने जाने मे परेशानी होती है । प्रतिवर्ष ये समाचार मिलते है कि अमुक जगह बच्चे स्कूल से निकले लेकिन गर्मी के कारण प्यास की वजह से अपनी जान बचा नहीं सके । इन सब परिस्थितियो को ध्यान मे रखकर सरकार को स्कूलो के बढाए जा रहे समय पर चिन्तन कर पुनर्विचार करना चाहिए तथा मनो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यदि उसे लगे कि ये सही है व बाल मनो विज्ञान के अनुकूल है तो ही इसे लागू करना चाहिए । शिक्षा विभाग को प्रयोग शाला  बनाना उचित नहीं है कि ये देखा जाएं कि एक बार देखते है यदि उचित नहीं हुआ तो फेरबदल कर देगे यह सोच शिक्षा का बंटाधार कर देगी । शि़क्षा जैसे क्षेत्र मे प्रयोग उचित नहीं है ।

 हर विकसित देश मे किसी भी स्थिति को लागू करने से पूर्व उस पर प्रयोग किये जाते है उसके परिणामों को देखा जाता है और यदि वे अनुकूल हो तो ही उसे पूरी व्यवस्था मे लागू किया जाता है लेकिन हमारे देश मे पूरी व्यवस्था पर ही प्रयोग किया जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि उसे या तो बदलना पडता है या फिर वापस लेना पडता है । जो कि शिक्षा जैसे क्षेत्र मे उचित नहीं है । आवश्यकता इस बात है कि शिक्षा जैसे क्षेत्र मे किसी भी व्यवस्था को लागू करने से पूर्व उस पर गंभीर चिन्तन ही नहीं बल्कि उस पर प्रायोगिक तौर पर प्रयोगो के सफल व सुफल परिणाम आने पर ही लागू किया जाना चाहिए तब ही शिक्षा मे हमें सही परिणाम मिल सकेगे ।

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

क्यो आते है भूकम्प क्यो हिलती है पृथ्वी !

    एक भूकंप पृथ्वीकी परत (crust)से ऊर्जा के अचानक उत्पादन के परिणामस्वरूप आता है जो भूकंपी तरंगें (seismic wave) उत्पन्न करता है.भूकंप का रिकार्ड एक सीस्मोमीटर (seismometer) के साथ रखा जाता है, जो सीस्मोग्राफ भी कहलाता है. एक भूकंप का क्षण परिमाण (moment magnitude) पारंपरिक रूप से मापा जाता है, या सम्बंधित और अप्रचलित रिक्टर (Richter) परिमाण लिया जाता है, ३ या कम परिमाण की रिक्टर तीव्रता का भूकंप अक्सर इम्परसेप्टीबल होता है और ७ रिक्टर की तीव्रता का भूकंप बड़े क्षेत्रों में गंभीर क्षति का कारन होता है. झटकों की तीव्रता का मापन विकसित मरकैली पैमाने पर (Mercalli scale) किया जाता है.

    पृथ्वी की सतह पर, भूकंप अपने आप को, भूमि को हिलाकर या विस्थापित कर के प्रकट करता है.जब एक बड़ा भूकंप अधिकेन्द्र (epicenter) अपतटीय स्थति में होता है, यह समुद्र के किनारे पर पर्याप्त मात्रा में विस्थापन का कारण बनता है, जो सूनामी का कारण है. भूकंप के झटके कभी-कभी भूस्खलन और ज्वालामुखी गतिविधियों को भी पैदा कर सकते हैं.

    सर्वाधिक सामान्य अर्थ में, किसी भी सीस्मिक घटना का वर्णन करने के लिए भूकंप शब्द का प्रयोग किया जाता है, एक प्राकृतिक घटना (phenomenon)या मनुष्यों के कारण हुई कोई घटना -जो सीस्मिक तरंगों (seismic wave)को उत्पन्न करती है.अक्सर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं, भारी मात्रा में गैस प्रवास , पृथ्वी के भीतर मुख्यतः गहरी मीथेन, ज्वालामुखी, भूस्खलन, और नाभिकीय परिक्षण ऐसे मुख्य दोष हैं.

    भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारंभिक बिन्दु केन्द्र (focus) या हाईपो सेंटर (hypocenter)कहलाता है .शब्द अधिकेन्द्र (epicenter) का अर्थ है, भूमि के स्तर पर ठीक इसके ऊपर का बिन्दु.

 स्वाभाविक रूप से होने वाले भूकंप

   टेक्टोनिक भूकंप भूमि के ऐसे किसी भी स्थान पर आ सकता है, जहाँ पर्याप्त मात्रा में संग्रहीत प्रत्यास्थता तनाव उर्जा होती है जो समतल दोष (fault plane) के साथ भू-भंग उत्पन्न करती है.रूपांतरित (transform) या अभिकेंद्रित (convergent) प्रकार की प्लेट सीमाओं के मामलों में, जो धरती पर सबसे बड़ी दोष सतह बनते हैं, वे एक दूसरे को सामान्य रूप से और असीस्मिक रूप (aseismically) से हिलाते हैं, ऐसा केवल तभी होता है जब सीमा के साथ किसी प्रकार की अनियमितता न हो जो घर्षण के कारण प्रतिरोध को बढाती है. अधिकांश सतहों में इस प्रकार की अनियमितताएं होती हैं और यह स्टिक-स्लिप व्यवहार (stick-slip behaviour) का कारण बनती हैं.एक बार जब सीमा बंद हो जाती है, प्लेटों के बीच में सतत सापेक्ष गति तनाव को बढ़ा देती है, इसलिए, दोष सतह के चारों और के स्थान में तनाव उर्जा संगृहीत हो जाती है.यह तब तक जारी रहता है जब तनाव पर्याप्त मात्रा में बढ़कर अनियमितता को उत्पन्न करता है, और दोष सतह की बंद सीमा के ऊपर अचानक भूमि खिसकने लगती है, संग्रहीत ऊर्जा मुक्त होने लगती है.यह ऊर्जा विकिरित प्रत्यास्थ तनाव (strain) भूकंपीय तरंगों (seismic waves), दोष सतह पर घर्षण की उष्मा ,और चट्टानों में दरार पड़ने, के सम्मिलित प्रभाव के कारण मुक्त होती है, और इस प्रकार भूकंप का कारण बनती है.तनाव के बनने की यह क्रमिक प्रक्रिया, अचानक भूकंप की विफलता के कारण होती है इसे प्रत्यास्थता-पुनर्बंधन सिद्धांत (Elastic-rebound theory) कहते हैं. यह अनुमान लगाया गया है की भूकंप की कुल ऊर्जा का १० प्रतिशत या इससे भी कम सीस्मिक ऊर्जा के रूप में विकिरित होता है. भूकंप की अधिकांश उर्जा या तो भू भंग (fracture) की वृद्धि को शक्ति प्रदान करने के लिए काम में आती है या घर्षण के कारण उत्पन्न ऊष्मा में बदल जाती है. इसलिए भूकंप पृथ्वी की उपलब्ध प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा को कम करता है और इसका तापमान बढाता है, हालाँकि ये परिवर्तन पृथ्वी की गहराई में से बाहर आने वाली उष्मा संचरण और संवहन की तुलना में नगण्य होते हैं.

प्लेट सीमाओं से दूर भूकंप.

    जहाँ प्लेट सीमायें महाद्वीपीय स्थलमंडल में उत्पन्न होती हैं, विरूपण प्लेट की सीमा से बड़े क्षेत्र में फ़ैल जाता है.महाद्वीपीय विरूपण San Andreas दोष (San Andreas fault) के मामले में, बहुत से भूकंप प्लेट सीमा से दूर उत्पन्न होते हैं और विरूपण के व्यापक क्षेत्र में विकसित तनाव से सम्बंधित होते हैं, यह विरूपण दोष क्षेत्र (उदा. बिग बंद क्षेत्र ) में प्रमुख अनियमितताओं के कारण होते हैं. Northridge भूकंप (Northridge earthquake) ऐसे ही एक क्षेत्र में अंध दबाव गति से सम्बंधित था.एक अन्य उदाहरण है अरब (Arabian) और यूरेशियन प्लेट (Eurasian plate)स के बीच तिर्यक अभिकेंद्रित प्लेट सीमा जहाँ यह ज़ाग्रोस (Zagros) पहाड़ों के पश्चिमोत्तर हिस्से से होकर जाती है.इस प्लेट सीमा से सम्बंधित विरूपण, एक बड़े पश्चिम-दक्षिण सीमा के लम्बवत लगभग शुद्ध दबाव गति तथा वास्तविक प्लेट सीमा के नजदीक हाल ही में हुए मुख्य दोष के किनारे हुए लगभग शुद्ध स्ट्रीक-स्लिप गति में विभाजित है. इसका प्रदर्शन भूकंप की केन्द्रीय क्रियाविधि (focal mechanism)के द्वारा किया जाता है

    सभी टेक्टोनिक प्लेट्स में आंतरिक दबाव क्षेत्र होते हैं जो अपनी पड़ोसी प्लेटों के साथ अंतर्क्रिया के कारण या तलछटी लदान या उतराई के कारण होते हैं.( जैसे deglaciation ) .ये तनाव उपस्थित दोष सतहों के किनारे विफलता का पर्याप्त कारण हो सकते हैं, ये अन्तःप्लेट भूकंप (intraplate earthquake) को जन्म देते हैं.

उथला - और गहरे केन्द्र का भूकंप

    अधिकांश टेक्टोनिक भूकंप १० किलोमीटर से अधिक की गहराई से उत्पन्न नहीं होते हैं.७० किलोमीटर से कम की गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकंप 'छिछले-केन्द्र' के भूकंप कहलाते हैं, जबकि ७०-३०० किलोमीटर के बीच की गहराई से उत्पन्न होने वाले भूकंप 'मध्य -केन्द्रीय' या 'अन्तर मध्य-केन्द्रीय' भूकंप कहलाते हैं. subduction क्षेत्र (subduction zones) में जहाँ पुरानी और ठंडी समुद्री परत (oceanic crust) अन्य टेक्टोनिक प्लेट के नीचे खिसक जाती है, गहरे केंद्रित भूकंप (deep-focus earthquake) अधिक गहराई पर ( ३०० से लेकर ७०० किलोमीटर तक ) आ सकते हैं.सीस्मिक रूप से subduction के ये सक्रीय क्षेत्र Wadati - Benioff क्षेत्र (Wadati-Benioff zone)स कहलाते हैं.गहरे केन्द्र के भूकंप उस गहराई पर उत्पन्न होते हैं जहाँ उच्च तापमान और दबाव के कारण subducted स्थलमंडल (lithosphere) भंगुर नहीं होना चाहिए.गहरे केन्द्र के भूकंप के उत्पन्न होने के लिए एक संभावित क्रियाविधि है ओलीवाइन के कारण उत्पन्न दोष जो spinel (spinel) संरचना में एक अवस्था संक्रमण (phase transition) के दोरान होता है.

भूकंप और ज्वालामुखी गतिविधि

    भूकंप अक्सर ज्वालामुखी क्षेत्रों में भी उत्पन्न होते हैं, यहाँ इनके दो कारण होते हैं टेक्टोनिक दोष तथा ज्वालामुखी में लावा (magma) की गतियां.ऐसे भूकंप ज्वालामुखी विस्फोट की पूर्व चेतावनी हो सकते हैं.

भूकंप समूहों

    एक क्रम में होने वाले अधिकांश भूकंप, स्थान और समय के संदर्भ में एक दूसरे से सम्बंधित हो सकते हैं.

भूकंप झुंड

    यदि ऐसा कोई झटका न आए जिसे स्पष्ट रूप से मुख्य झटका कहा जा सके, तो इन झटकों के क्रम को भूकंप झुंड कहा जाता है.

भूकंप तूफान

     कई बार भूकम्पों की एक श्रृंख्ला भूकंप तूफ़ान (earthquake storm) के रूप में उत्पन्न होती है, जहाँ भूकंप समूह में दोष उत्पन्न करता है, प्रत्येक झटके में पूर्व झटके के तनाव का पुनर्वितरण होता है. ये बाद के झटके (aftershock) के समान है लेकिन दोष का अनुगामी भाग है, ये तूफ़ान कई वर्षों की अवधि में उत्पन्न होते हैं, और कई बाद में आने वाले भूकंप उतने ही क्षतिकारक होते हैं जितने कि पहले वाले. इस प्रकार का प्रतिरूप तुर्की में २० वीं सदी में देखा गया जहाँ लगभग एक दर्जन भूकम्पों के क्रम ने उत्तर Anatolian दोष (North Anatolian Fault) पर प्रहार किया, इसे मध्य पूर्व में भूकंप के बड़े गुच्छों के रूप में माना जाता है. ब्ल्द्क वे ल्स

भूकंप के प्रभाव

    १७५५ तांबे का चित्रण उत्कीर्णन लिस्बन खंडहर में बदल गया और १७५५ में लिस्बन में भूकंप (1755 Lisbon earthquake) के बाद जल कर राख हो गया.एक सूनामी बंदरगाह में जहाजो को बहा ले जाती है.


भूकंप के प्रभावों में निम्न लिखित शामिल हैं, लेकिन ये प्रभाव यहाँ तक ही सीमित नहीं हैं.

झटके और भूमि का फटना.

    झटके और भूमि का फटना भूकंप के मुख्य प्रभाव हैं, जो मुख्य रूप से इमारतों व अन्य कठोर संरचनाओं कम या अधिक गंभीर नुक्सान पहुचती है.स्थानीय प्रभाव कि गंभीरता भूकंप के परिमाण (magnitude) के जटिल संयोजन पर, epicenter (epicenter) से दूरी पर और स्थानीय भू वैज्ञानिक व् भू आकरिकीय स्थितियों पर निर्भर करती है, जो तरंग के प्रसार (wave propagation) कम या अधिक कर सकती है. भूमि के झटकों को भूमि त्वरण (acceleration) से नापा जाता है.

    विशिष्ट भूवैज्ञानिक , भू आकरिकीय, और भू संरचनात्मक लक्षण भू सतह पर उच्च स्तरीय झटके पैदा कर सकते हैं, यहाँ तक कि कम तीव्रता के भूकंप भी ऐसा करने में सक्षम हैं. यह प्रभाव स्थानीय प्रवर्धन कहलाता है.यह मुख्यतः कठोर गहरी मृदा से सतही कोमल मृदा तक भूकम्पीय (seismic) गति के स्थानांतरण के कारण है और भूकंपीय उर्जा के केन्द्रीकरण का प्रभाव जमावों कि प्रारूपिक ज्यामितीय सेटिंग करता है.

    दोष सतह के किनारे पर भूमि कि सतह का विस्थापन व भूमि का फटना दृश्य है, ये मुख्य भूकम्पों के मामलों में कुछ मीटर तक हो सकता है.भूमि का फटना प्रमुख अभियांत्रिकी संरचनाओं जैसे बांधों (dams), पुल (bridges) और परमाणु शक्ति स्टेशनों (nuclear power stations) के लिए बहुत बड़ा जोखिम है, सावधानीपूर्वक इनमें आए दोषों या संभावित भू स्फतन को पहचानना बहुत जरुरी है

भूस्खलन और हिम स्खलन

   भूकंप, भूस्खलन (landslide)और हिम स्खलन पैदा कर सकता है, जो पहाड़ी और पर्वतीय इलाकों में क्षति का कारण हो सकता है.

अग्नि

    एक भूकंप के बाद, किसी लाइन या विद्युत शक्ति (electrical power) के टूट जाने से आग (fire) लग सकता है.यदि जल का मुख्य स्रोत फट जाए या दबाव कम हो जाए, तो एक बार आग शुरू हो जाने के बाद इसे फैलने से रोकना कठिन हो जाता है.

मिट्टी द्रवीकरण

       मिट्टी द्रवीकरण (Soil liquefaction) तब होता है जब झटकों के कारण जल संतृप्त दानेदार (granular) पदार्थ अस्थायी रूप से अपनी क्षमता को खो देता है, और एक ठोस (solid) से तरल (liquid) में रूपांतरित हो जाता है.मिट्टी द्रवीकरण कठोर संरचनाओं जैसे इमारतों और पुलों को द्रवीभूत में झुका सकता है या डूबा सकता है.

सुनामी

    समुद्र के भीतर भूकंप से या भूकंप के कारण हुए भू स्खलन के समुद्र में टकराने से सुनामी आ सकता है. उदाहरण के लिए , २००४ हिंद महासागर में आए भूकंप.

बाढ़
    यदि बाँध क्षतिग्रस्त हो जाएँ तो बाढ़ भूकंप का द्वितीयक प्रभाव हो सकता है.
भूकंप के कारण भूमि फिसल कर बाँध की नदी में टकरा सकती है, जिसके कारण बाँध टूट सकता है और बाढ़ आ सकती है.

मानव प्रभाव

    भूकंप रोग, मूलभूत आवश्यकताओं की कमी , जीवन की हानि , उच्च बीमा प्रीमियम , सामान्य सम्पत्ति की क्षति , सड़क और पुल का नुकसान , और इमारतों को ध्वस्त होना, या इमारतों के आधार का कमजोर हो जाना , इन सब का कारण हो सकता है, जो भविष्य में फ़िर से भूकंप का कारण बनता है.
मानव पर पड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव है, जीवन की क्षति.

 धर्म और पौराणिक कथाओं में भूकंप

     Norse पौराणिक कथाओं (Norse mythology) में, भूकंप को देवता Loki (Loki) के हिंसक संघर्ष के रूप में बताया गया है. जब शरारत और संघर्ष के देवता (god)लोकी ने, सौंदर्य और प्रकाश के देवता Baldr (Baldr) की हत्या कर दी, उसे दण्डित करने के लिए एक गुफा में बंद कर दिया गया, उसके पर एक जहरीला सांप रख दिया गया, जिससे उसके सर पर जहर टपक रहा था.Loki की पत्नी Sigyn (Sigyn) उसके पास एक कटोरा लेकर खड़ी हो गई जिसमें वह जहर इकठ्ठा कर रही थी, लेकिन जब भी वह कटोरे को खाली करती, जहर लोकी के चेहरे पर गिर जाता, तब वह उसे बचाने के लिए उसके सर पर दूसरी और धक्का देती, जिससे धरती कांपने लगती
ग्रीक पौराणिक कथाओं में नेप्चून भूकंप के देवता थे