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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जन लोकपाल विधेयक व सरकारी लोकपाल बिल के प्रावधानों के मुख्य विरोधाभाषी बिन्दु



     भ्रष्टाचार  रोकने पर आने वाले लोकपाल विधेयक पर अन्ना हजारे के नैतृत्व में सैकडों लोग दिल्ली में अनशन पर बैठे है यही नहीं देश के कई शहरों में भी आम व खास लोग उनके इस आन्दोलन के समर्थन में अनशन पर बैठे हैं । आखिर क्या है ऐसा इस विधेयक में जिसका अन्ना हजारे व उनके समर्थक विरोध कर रहे है।  सरकार भी इस विधेयक के द्वारा भ्रष्टाचार को रोकना चाहती है और अन्ना हजारे का मकसद भी भ्रष्टाचार को रोकना ही है । फिर एक ही मुद्दे पर दोनो आमने सामने क्यों है । आइये  सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल और अन्ना हजारे व उनके समर्थको द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक में क्या अन्तर है समझने का प्रयास करें । हांलाकि पूरे बिल का एक एक बिन्दु पर  तो  चर्चा यहां संभव नहीं है लेकिन मूल भूत अन्तर को समझने का प्रयास करते हैं ।
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के दायरे में क्षेत्र के सांसद मंत्री और प्रधानमंत्री को शामिल किया गया है जबकि अन्ना हजारे व उनके समर्थको द्वारा तैयार किये गऐ लोकपाल मसौदे में प्रधानमंत्री सहित नेता अधिकारी व न्यायपालिका  को भी विधेयक के दायरे में शामिल करने की मांग की जा रही हैं 
सरकारी लोकपाल विधेयक में लोकपाल के पद पर सेवानिवृत तीन न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था है जबकि अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक में 10 लोकपाल की जूरी होने तथा उसमें से चार कानूनी पृष्ठभूमि के सदस्य होना जरूरी करने और शेष छह सदस्यो का चयन किसी भी क्षेत्र से करना शामिल है इसके अलावा इनमे से ही एक को इस जूरी का अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की जा रही है
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक में आम लोगो को अपनी शिकायत लोकसभा अध्यक्ष अथवा राज्य सभा अध्यक्ष को भेजनी होगी तथा उनकी स्वीकृति के बाद ही किसी सांसद मंत्री अथवा प्रधानमंत्री पर कार्यवाही संभव होगी जबकि प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक में लोकपाल स्वयं किसी भी मामले पर प्रसंज्ञान ले सकेगे उन्हें किसी से भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी ।
सरकारी लोकपाल विधेयक में लोकपाल केवल अपनी राय दे सकते है  उनकी राय अधिकार प्राप्त संस्था के पास भेजी जाएगी वही संस्था फैसला करेगी जबकि मंत्रीमंडल के सदस्यों के बारे में फैसला प्रधानमत्री करेगे जबकि अन्ना हजारे व उनके समर्थको द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल बिल मे जन लोकपाल ही सशक्त संस्था होनी चाहिए उसे किसी भी अधिकारी के खिलाफ प्रसंज्ञान लेने प्राथमिकी दर्ज कराने तथा अपनी पुलिस फोर्स होने का अधिकार होना चाहिए तथा भ्रष्ट अधिकारी को बर्खास्त किये जाने का प्रावधान किये जाने की मांग की जा रही है
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक मे लोकपाल के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार एक समिति को होगा जिसमें उपराष्ट्पति प्रधानमंत्री दोनो सदनो के नेता दोनो सदनो के विपक्ष के नेता कानून व गृह मंत्री होगे जबकि जन लोकपाल विधेयक में लोकपाल के सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार न्यायिक क्षेत्र के लोगो मुख्य चुनाव आयुक्त नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भारतीय मूल के नोबेल व मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त लोगो को होना  चाहिए 
सरकार द्वारा प्रस्तावित बिल मे दोषी को छह माह से सात माह की सजा का प्रावधान है जबकि जन लोकपाल बिल मे कम से कम पांच साल और अधिकतम उम्र कैद तक का प्रावधान करने और घोटाले की राशि की भरपाई का प्रावधान किये जाने की मांग की जा रही है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल मे शिकायत झूठी पाए जाने पर शिकायत कर्ता को जेल भी भेजा जा सकने का प्रावधान है जबकि जन लोक पाल बिल मे झूठी शिकायत करने पर जुर्माने का प्रावधान किये जाने की मांग की जा रही है
ऐसी स्थिति में जिनमें लोकपाल भ्रष्ट पाया जाए तो जन लोकपाल बिल मे उसको पद से हटाएा जाने का प्रावधान किये जाने की मांग की जा रही है। इसी के साथ केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त सीबीआई की भ्रष्ट्ाचार निरोधक शाखा को भी जन लोकपाल का हिस्सा बनाने का प्रावधान किये जाने की मांग की जा रही है
मुख्य रूप से इन बिन्दुओं को लेकर ही अन्ना हजारे व उनके समर्थक सरकार के प्रस्तावित लोकपाल विधेयक का विरोध कर रहे है । हांलाकि इसके अलावा भी कई छोटे मोटे प्रावधान हो सकते है जिन पर उनकी राय सरकार के प्रावधानो से कुछ अलग हो लेकिन मुख्यतया ये ही बिन्दु है जिस पर पूरे भारत मे माहोल गर्माया हुंआ है । सुधि पाठको से यह अपेक्षा है कि वे अपने विवेक से यह निर्णय करें कि किन बिन्दुओं पर सरकार को अन्ना हजारे की बातों को मान लेना चाहिए और किन बिन्दुओं पर अन्ना हजारे व उनके समर्थको को सरकार के प्रावधानो का समर्थन करना चाहिए । लोकतांित्रक प्रणाली में किसी एक पक्ष की बात मान लेना भी अहितकर हो सकता है ।s

अन्ना का आंदोलन जनता की भावना


       अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार हटाओं मुहिम में हजारों लोग जुड रहे है । केन्द्र सरकार हिलती दिखाई दे रही है । क्योंकि आज भ्रष्टाचार से आम आदमी दुखी है इसीलिए ऐसा कोई व्यक्ति आगे आए तो जनता का उसके साथ होना लाजिमी ही है । आम आदमी भ्रष्टाचार से इतना दुखी हो गया है कि कोई भी काम बिना रिश्वत के नहंी होता । सही और वाजिब कार्य के लिए भी सिफारिश और पैसा दोनो देने पडते है । जनता भीतर ही भीतर इस भ्रष्टाचार से त्रस्त थी जैसे ही जनता की दुखती रग पर कोई हाथ रखकर उसे सहलाने वाला दिखा जनता उसके साथ हो ली । अन्ना का यह आंदोलन जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है गांव शहर सभी उनके साथ जुड रहे हैं वकील डाक्टर राजनीतिज्ञ समाजसेवी युवा वर्ग महिलांए सब कोई अन्ना के साथ खडा दिखाई देता हैं

       आम जनता का साथ तो अन्ना को मिल ही रहा है लेकिन इनके साथ वे भ्रष्ट राजनीतिज्ञ भी अन्ना की इस मुहिम में शामिल होकर अपने को पाक साफ साबित करने में जुटे है जिनके अगर आय के स्त्रोतो की जांच की जाए तो परत दर परत भ्रष्टाचार से कमाई गइ्र्र करोडो की सम्पतिं का खुलासा हो सकता हैं । अन्ना को ऐसे लोगो से अपने आंदोलन से दूर रखना होगा जो भेड की खाल में हैं ।

             वकील भी अन्ना का समर्थन कर रहे है लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि न्याय के मंदिर में ही सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है । अदालतों में तारीख पेशी के लिए पेशकारों की क्या खातिरदारी करनी पडती है किसी से छिपा नहीं है  किसी निर्णय की कापी निकलवानी है तो आपको कोर्ट फीस के अलावा नजराना तो देना ही पडेगा । कार्यालयो की कार्य प्रणाली को तो अब हमने मान्यता ही दे दी हैं।

      भ्रष्टाचार उपर से नीचे की ओर चलता है । जब मंत्री अधिकारी भ्रष्ट होते है तो पूरा तंत्र भ्रष्ट होने लगता है । आज हमारे देश में पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो चुका है । उसे अन्ना का आंदोलन कितना समाप्त कर सकेगा कहा नहीं जा सकता लेकिन इस पर अंकुश जरूर लग सकता हैं । लेकिन पवि़त्र आंदोलन की बागडोर उन भ्रष्ट लोगो के हाथ में नही जानी चाहिए जो देश को लूट रहे है और दिखावा ऐसा कर रहे है जैसे उन जैसा कोई पाक साफ है ही नही । जरूरत है ऐसे लोगो को पहचान कर उनको इस पवित्र आंदोलन से दूर रखने की । नही तो अन्ना का यह आंदोलन भी अपनी दिशा से भटक जाएंगा

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

जलजलों के मुख पर बसा जापान

जलजलों के मुख पर बसा जापान देश इस बार पिछले 140 वर्षो के भंयकर दौर से गुजर रहा है। वहां भूकम्प के बाद आई सुनामी ने कोढ में खाज का काम किया है। भूकम्प की तीव्रता जहा रिचर स्केल पर 8‘8 से 9 तक आंकी जा रही है वहंी सुनामी ने तो वहां ऐसा कहर ढाया है कि क्या हवाई जहाज क्या पानी के जहाज ऐसे बह गए है जैसे कोई खिलौने बह रहे है कारों और मकानों की हालत तो तिनके की तरह होकर रह गई । जापान के लोग जितने मेहनती व जिम्मेदार माने जाते है प्रकृति उनकी परीक्षा उतनी ही ज्यादा लेती है । यहीं तक नहीं रूका है जापान का कहर जापान के 10 रिएक्टरों मे से 3 में रिसाव की जो संभावनाए व्यक्त की जा रही है वह कोढ में खाज ही नहीं वरन् कोढ में घाव की स्थिति कही जा सकती है। जापान में आए इस जलजले की भेंठ करीब 10000 लोगों के चढने की संभावना व्यक्त की जा रही है जबकि जिस तरह की तबाही सामने आ रही है उससे नहीं लगता कि ये 10000 तक सीमित रह सकती है । वहा आए भूकम्प के तेज गति की दो रेल गाडिंयों का कोई अता पता नहीं है।
   जो देश विश्व में सबसे ज्यादा भूकम्प सहता रहा हों वहा की सरकार इस प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन में चूक कैसे गई समझ से परे है। बताया जाता है कि परमाणु रिएक्टरों की बुनियाद इस आधार पर रखी गई थी कि यदि भूकम्प की तीव्रता 8.8 तक हो तो इन रिएक्टरों को कोई नुकसान नही हो सकता था लेकिन भूकम्प ने तो 9 की तीव्रता की तबाही लाकर जापानी सरकार के सभी प्राकृतिक आपदा प्रबधंन को ही हिला कर रख दिया हैं । कितना कुछ सोचा जाएं लेकिन प्रकृति मानवीय प्रबंधन को तहस नहस कर सभ्यताआं का विनाश कर देती है ये साबित हो गया हैं । विज्ञान चाहें कितनी ही प्रगति कर लें लेकिन प्रकृति की नियति के आगे वह बेबस ही रहेगा ये जापान के जलजले ने एक बार फिर साबित कर दिया है।
   जापान के परमाणु रिएक्टरों से जो खतरा जापान को होने की संभावना है उससे पूरे विश्व में इस पर विचार करने का समय आ गया है कि जो हमारे वैज्ञानिक सोच नहीं सकते वो प्रकृति कर सकती है और बेेवस हो जाते हैं । जापान विश्व का एक मात्र देश है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के विनाश के बाद अपने को न केवल संभाला बल्कि इस स्थिति में ला खडा किया कि उसकी बराबरी इतने कम समय मे अमरिका तक नहीं कर सकता। जापान की टेक्नोलाजी का मुकाबला कोई नहीं कर सकता लेकिन वो ही जापान आज अपनी इतनी टैक्नोलाSजी के बाद भी प्रकृति के सामने बेवस दिखाई दे रहा हैं । कल्पना किजिए यदि ऐसा ही जलजला व सुनामी अगर विश्व के किसी अन्य देश में आई होती तो जान माल की हानि र्कइं गुना ज्यादा होती । और वह देश विश्व के नक्शे से गायब हो जाता क्योंकि विश्व के किसी भी देश में इस तरह की आपदाओं से निपटने के लिए किसी तरह का पुख्ता एवं प्रभावी आपदा प्रबंधन नहीं है। ।
    हम अगर भारत की ही बात ले तो यहां तो केवल आग लगने के बाद कुंआ खोदने की पंरपरा रही है। लातूर के भूकम्प के बाद हमने क्या प्रबंध किये है भूकम्प से निपटने के लिए ये किसी से छिपा नहीं हैंा यदि यही तीव्रता का भूकम्प भारत में आया होता तो यहा लाखों लोगो की जान जा चुकी होती । लातूर के बाद भी हमने न केवल गुजरात में बल्कि भारत के किसी भी प्रांत में ऐसे भूकम्प रोधी मकानों की कोई कल्पना तक नहीं की है जिससे कि ऐसी स्थिति आने पर जान माल के नुकसान को कम किया जा सकें । लातूर में भूकम्प रोधी मकान बनाए गए हो ये कुछ हद तक संभव हो सकता है लेकिन भारत के किसी अन्य क्षेत्र में ऐसा हुआ तो हमने क्या तैयारी की है ये स्वयं हमारी सरकार नहीं जानती । प्राकृतिक आपदा पहले ही कोई संदेश देकर नहीं आती की वो किसी विशेष क्षेत्र में आाने वाली है जो हमारी सरकार वहा प्रबंध कर लें वो तो कहीं भी किसी भी समय आ सकती है । जो जापान सरकार जानती है कि उसका देश भूकम्पों के मुहाने पर बैठा है उसने ऐसे मकान बनाए जिनसे भूकम्प का असर सबसे कम हो लेकिन इस बार के भूकम्प ने बावजूद सरकार व जनता की तैयारी के ऐसी तबाही मचा दी तो जरा सोचिए ऐसे देश में जहा लातूर जैसी घटनाओं के बाद भी कोई प्रबंध नहीं किये जाते वहा इस तरह की आने वाली आपदा से कितनी जनहानि हो सकती है कल्पना ही नहीं की जा सकती ।
    जापान की इस घटना ने वैज्ञानिक और टेक्नालाजी के क्षेत्र में काम करने वाले लोगो को एक बार फिर ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि परमाणु रिएक्टरों से विकास की दौड में हम ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कितना सुरक्षित बना रहे है एक तरफ विकास के नाम पर विश्व के सभी देश परमाणु रिएक्टरों की स्थापना करते जा रहे है लेकिन वे परमाणु रिएक्टर इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए कितने सुरक्षित है ये नही सोचा जा रहा । भारत में तो ऐसी किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए र्कोइे प्रबंध शायद ही किसी परमाणु रिएक्टर में हो । भूकम्प का सामना ये रिएक्टर कितना कर पाऐगे शायद ही कोई जानता हो क्योंकि हम यह जान लेते है कि रिचर स्केल पर 9 की तीव्रता वाला भूकम्प भारत में तो नहीं आ सकता । लेकिन आपदा अपना माप बताकर नहीं आती ।
     इस जलजले ने कई सवाल खडे कर दिए है पूरे विश्व को परमाणु संयंत्र की स्थापना से पूर्व आने वाली सभी प्रकार की आपदओं का अधिकतम से अधिकतम आंकलन कर उसी अनुरूप् सुरक्षा उपाय करने होगे । जापान में यदि 10 में से 3 रिएक्टरों के भी रेडिएशन होता है तो जलजले व सुनामी से ज्यादा नुकसान इन रेडिएशेन से होना संभव है। ऐसा विकास क्या काम का जिससे जनहानि प्राकृतिक आपदा से भी ज्यादा हमारे विकास की अंधाधुध दोड के कारण हो । हालाकि वैज्ञानिक ये कह रहे है कि सुरक्षा प्रबंध पुख्ता है यदि ऐसा है तो फुफुशिमा व के आसपास के करीब साढे तीन लोगो को दूसरी सुरक्षित जगह पर जाने का क्यों कहा गया हैं ये इस बात की पुष्टि है कि स्वयं वैज्ञानिक भी आश्वत नहीं है कि इन रिएक्ब्टरों से जनहानि नहीं होगी । जापान की सरकार व जनता तो इतनी जागरूक है कवह अपने अतीत से सीख लेकर अपने भविष्य का महल उसी अनुरूप खडा करते है लेकिन हमारे भारतीय परिपेक्ष्य में न तो हमारी सरकार अपने अतीत से कोई सबक लेती है और न ही जनता इतनी जागरूक है कि अपने भविष्य का महल और सुरक्षित खडा कर सकें । यहा तो अतीत को भूलाकर उससे कोई सबक न लेकर उसी पुराने ढर्रै में अपना महल बनाने की एक बार फिर कोशिश की जाती है, चाहे उससे फिर कितना ही बडा नुकसान क्यों न हो जाए ।
     आज आवश्यकता जापान की आपदा से सबक लेकर हमें नए सिरे से सोचने की है कि यदि हमारे देश में होता है तो हम इसका मुकाबला करने के लिए कितने तैयार हैं

हम विकास के नाम पर अनजाने में ही अपना विनाश की ओर अग्रसर तो नहीं

जापान में भूकम्प और सुनामी के बाद परमाणु रिएक्टरों में हो रहे रेडिएशन ने पूरे विश्व को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि अंधाधुंध किये जा रहे विकास के नाम पर हम मानवीय सभ्यताओं को अनायास ही समाप्त करने जा रहे है। किसने सोचा था कि जापान जैसे टेक्नालाॅजीयुक्त देश में परमाणु रिएकटरों से इतना बडा खतरा पैदा हो जाएगा । फुकुसिमा के तीन रिएक्टरों में ब्लास्ट हो चुके है और चैथे में आग लग गई हैं । रेडिएशन का खतरा 100 प्रतिशत से भी ज्यादा हो चुका है । 5 लाख लोगों को वहां से हटा दिया गया है अथवा सचेत कर दिया गया है।
         भारत मे विकास के नाम पर परमाणु रिएक्टरों की संख्या वर्तमान में 10 के लगभग है। अब हमारी सरकार का यह दायित्व हो गया है िकवह यह सुनिश्चित करें कि पहले से स्थापित ये परमाणु बिजलीघर ऐसी किसी भी विपदा का सामना करने के लिए कितने सक्षम है। क्या इनमें सुरक्षा के सभी उपाय पर्याप्त है? या फिर भोपाल गैस कांड की तरह हमारी सुरक्षा है। क्योंकि आपदा कभी कहकर नहीं आती उसका तो आंकलन कर ही कदम उठाने पडते हैं लेकिन दुभाग्र्य ये है कि हमारे देश में सुरक्षा के नाम पर केवल खानापूर्ति ही होती है। जापान की परिस्थितियों के देखते हुए हमंें अपने परमाणु रिएक्टरों का पुनः परीक्षण करना चाहिए और सुरक्षा के उपायों की जांच कर उनमें पाई जाने वाली कमियों को तुरंत दूर कर लेना चाहिए । और भविष्य में स्थापित होने वाले परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए । वरना हमारे देश मे जान माल का काफी नुकसान हो सकता हैं।
           जापान के परमाणु रिएक्टरों मे होने वाले रेडिएशन का प्रभाव कई देशों तक पहुंचने की संभावना हैं इन परिस्थितियों ने ये सोचने को मजबूर कर दिया है कि किसी एक देश का विकास किसी दूसरे देश के लिए किस प्रकार विनाश का कारण बन सकता है। 160 किलोमीटर उचे उड रहे विमान में रेडिएशन का प्रभाव दिखाई देना ये संकेत देता है कि खतरा कितना गंभीर है।          भारत में तो अंधाधुध परमाणु रिएक्टरों की स्थापना करने के प्रस्ताव विचाराधिन है अर्थात् हम विकास के नाम पर अनजाने में ही अपना विनाश करने की ओर अग्रसर है जबकि हमारे पास पवन उर्जा ,सौर उर्जा जैसे ऐसे विकास के स्त्रोत मोैजूद है जिनसे हम विकास भी कर सकते है ओैर विनाश की सबसे कम संभावना भी है । हम इन स्त्रोतों की ओर क्यों नहीं ध्यान दे रहे जो हमारे विकास के द्वार भी खोलेगे और आपदा होने पर जनहानि भी परमाणु रिएक्टरों की अपेक्षा कम होगी ।

तीसरे विश्व युद्ध की आहट

लीबिया के तानशाह कर्नल गद्दाफी द्वारा अपने ही नागरिकों के खिलाफ किये जा रहे अत्याचारों ने लगता है विश्व मे तीसरे विश्वयुद्ध का शंखनाद कर दिया है। हाॅलाकि अमरिका ब्रिटृन व फ्रांस ने  नो फ्लाई जोन घोषित होने के बाद भी कर्नल गद्दाफी के निवास पर मिसाइलों से हमले किए है उनका तर्क है कि कर्नल गद्दाफी नो फृलाई जोन के बाद भी लीबिया मे कत्ले आम कर रहे है। इस कारण उन्हें सबक सिखाने के लिए ये हमले किये गये है । इन हमलों के बाद गद्दाफी ने अपने प्रसारण में कहा है कि  वे आखिरी दम तक इसका मुकाबला करेगें । अर्थात् ऐसा लगता है कि तीसरे विश्वयुद्ध की रणभेरी बज चुकी है। म्झे नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी याद आ रही है जिसमें उन्होने कहा था कि
• Nostradamus - The Strange Prophecies
Nostradamus Predictions that Came True: 2010
There have been no such cases, where... Nostradamus predictions have come true this year. However, in future, in the same year, the great seer has foretold of a comet, called Wormwood, striking the Earth's surface and creating a huge disaster. He has also predicted that the World War 3 will start sometime between 2011 and 2012 and that it will be a war between the Christian world and the Arab world. The war will destroy many countries, except for the countries who will not take part in the war and that's India and China.

There are several more of Nostradamus predictions that came true, many events that will shock you, many events that will happen. In fact he has also predicted the end of the world in 2012. But, that is no reason why you should leave everything and sit and worry. What will come, will come, and when it comes, we will all face it together.

तीसरा विश्वयुद्ध 2011- 2012 मे शुरू होगा और यह यूरोपीय समुदाय व अरब समुदाय के बीच होगा। वर्तमान परिस्थितियां वैसी ही है जैसी कि नास्त्रेदमस ने अपनी भविष्यवाणी मे कही हैं । लीबिया अरब  अफ्रीकी देश है तथा फ्रांस ब्रिट्न व अमरिका यूरोपीय देश ।  क्या नास्त्रेदमस की  भविष्यवाणी सही साबित होगी और पूरा विश्व तीसरे विश्वयुद्ध की चपेट में आ जाएगा
पूरे विश्व का ध्रुवीकरण होता दिखाई दे रहा हैं  रूस चीन व भारत ने लीबिया पर हमले की निंदा की है वहीं अरब अफ्रीकी देशों का धु्रवीकरण हो रहा हैं । विश्व इस मुद्दे पर बंटता दिखाई दे रहा है। अगर समझदारी से काम न लिया गया तो यह तीसरे विश्वयुद्ध की शुरूआत हो सकती है।  सुरक्षा परिषद् ने 18 मार्च 2011 को 10--0 से एक प्रस्ताव पारित कर नागरिकों और नागरिक क्षेत्रों को कर्नल गद्दाफी की फौज के हमलों से बचाने के लिए सदस्य देशो को सभी जरूरी कदम उठाने की अनुमति दी है ।  इस प्रस्ताव में चीन व रूस स्थाई सदस्यों व तीन अस्थाई सदस्य भारत जर्मनी व ब्राजील ने मतदान में भाग नहीं लिया । रूस ने इस प्रस्ताव के पारित होने पर कहा है कि इससे लीबियाई आम नागरिक के साथ साथ पूरे उत्तर अफ्रिकी और मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति और सुरक्षा पर बुरा असर पडेगा ।  चीन के दूत ने सुरक्षा परिषद में कहा कि चीन    22 सदस्यीय अरब लीक के रूख को महत्व देता है वे लीबिया पर -नो फ्लाई जोन चाहते है  इन सब को ध्यान मे रखते हुए चीन इस प्रस्ताव पर वोट के दौरान गैर हाजिर रहना चाहता हैं ।
इसके बाद ब्रिटे्न व फ्रांस के लीबिया की राजधानी त्रिपोली में मिसाइलों से हमले किये है ।    22 सदस्यीय अरब लीग के महासचिव अम्र मूसा ने कहा है कि लीग लीबिया के नागरिको की सुरक्षा चाहता है न कि उन पर ज्यादा से ज्यादा हवाई हमले।  उनका यह भी कहना है कि लीग ने सुरक्षा परिषद् द्वारा पारित प्रस्ताव का समर्थन इसलिए किया था कि कर्नल गद्दाफी जनता पर कहर ठा रहे है लेकिन फ्रांस व ब्रिट्न द्वारा किये जा रहे हवाई हमलें वहां की जनता के लिए परेशानी का सबब बन रहे है इसकी छूट नहीं दी जा सकती । इसका तात्पर्य है कि अरब लीग में भी इस फैसले को लेकर आवाज उठने लगी हैं । इन सबसे यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि विश्व के देश अलग अलग खेमों में बंटना शुरू हो चुके है।
क्या आप जानते है कि प्रथम विश्व युद्ध में भी ब्रिट्ेन अमरिका व फ्रांस की अहम भूमिका थी तो द्वितीय विश्व युद्ध में फ्रांस व बिटृेन की भूमिका भी कम नहीं थीं  और अगर तीसरा विश्व युद्ध होता है तो ब्रिटृन फ्रांस व अमरिका इसमें मुख्य भूमिका निभाते दिखाई दे रहे है। प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक हुआ  उसके करीब 21 साल बाद द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से  1945 तक हुआ और अब 66साल बाद एक बार फिर विश्व विनाश की ओर अग्रसर हो रहा हैं । क्या हम इसे रोक पाएंगे या नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी एक बार फिर सच साबित होकर ही रहेगी अगर ऐसा है तो इसके अनुसार तीसरा विश्व युद्ध कई देशों को नष्ट कर देगा जो इस युद्ध में भाग लेगें । उनके अनुसार इस युद्ध में भारत और चीन भाग नहीं लेगें और वे बच जाएंगें । आप हम वर्तमान परिस्थितियों को देख रहे है और हमारे सामने नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां भी
अब देखना यह है कि क्या होता हैं  तीसरा विश्व युद्ध होता है या नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी गलत साबित होती है । हम तो यही प्रार्थना करते है कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी गलत साबित हो और विश्व के देशों के प्रमुखों के अहम् टकराकर तीसरी प्रलय का कारण न बनें ।

क्या है भारत पाकिस्तान का मनौविज्ञान

विश्व कप क्रिकेट में भारत के पाकिस्तान से सेमीफाइनल मैच मोहाली में जीतने के बाद भारत के लोग ये मान कर चल रहे है जैसे भारत ने विश्व कप क्रिकेट का फाइनल मैच जीत लिया हो।भारतीय किक्रेट टीम ने पाकिस्तान को हरा कर जैसे विश्व कप जीत लिया हो अभी देश में ऐसा ही माहोल हैं । क्यों भारतीय जन मानस को ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान के हार जाने के बाद अब कुछ जीतना बाकी रहा ही न हों । ये मानसिकता क्यों है कि पाकिस्तान को हरा दिया इसका मतलब हमने सब कुछ जीत लिया । ये मनोविज्ञान न केवल भारतीयों का है बल्कि यही स्थिति पाकिस्तान के लोगो की भी है । पाकिस्तान की जनता भी अपनी टीम से यही अपेक्षा रखती है कि और किसी टीम से भले ही हार जाए लेकिन भारत की टीम से उसके देश का जीतना जरूरी हैं ।

दोनो देशों के जनमानस का ऐसा मनोविज्ञान क्यों है? समझ मे नहीं आता । करो या मरो का नारा इन टीमों के बीच होने वाले मैच मे ही क्यों हावी रहता है? हम एक कमजोर टीम से हार जाए तो देश मे कोई इतना बवाल या जिज्ञासा नहीं होती जितनी कि पाकिस्तान से हार जाने पर । वास्तव में हम पाकिस्तान को अपना सबसे बडा प्रतिद्वन्द्वि मानते है और पाकिस्तान हमें अपना प्रतिद्वन्द्वि मानता है । दोनो देशों के लोगो की यही प्रतिद्वन्द्विता ही इसके मूल कारण मे है ।

हाॅलाकि श्रीलंका से फाइनल जीतने पर ही हम विश्व कप क्रिकेट के सिरमौर होगे ये बात जानते हुए भी लोगों में जितना क्रेज पाकिस्तान के साथ खेले गए सेमीफाइनल में था उतना श्रीलंका के साथ फाइनल के लिए भी नहीं है ं हांलाकि हर भारतीय चाहता है कि इस बार विश्व कप भारत जीते लेकिन यदि श्रीलंका भी जीतती है तो भारतीयों को इतना दुख नहीं होगा जितना कि पाकिस्तान से हारने पर होता ।

हांलाकि मनौवैज्ञानिक ही इसका अच्छा विश्लेषण कर सकते है लेकिन आम धारणा यही होती है कि हमारे बराबरी का और हमारा कोई विशेष प्रिय आगे बढता है तो मन में एक भावना जाग्रंत होती है किवह प्रिय हमारे से आगे नहीं निकलना चाहिए। शायद हमारे बीच भी यही धारणा काम करती है । इसका अर्थ तो यही हुआ न कि हम कहीं न कहीं एक दूसरे को चाहते है लेकिन ईष्र्या की भावना हमें यह प्रदर्शित करने से रोक रही है।

देखिए अपने आस पास के वातावरण से ही ले तो हम अपने पडौसी की सुख सुविधा नहीं सहन कर सकते यदि उसके यहां कोई चीज आती है तो हमारे पास भी वह चीज होनी चाहिए । ये भी तो ईष्र्या ही है ना ं यही नहीं दो भाइ्र्र अलग अलग अपना परिवार चला रहे है लेकिन एक के यहां कोई नई वस्तु आती है तो दूसरे के यहां भी आपकों जल्दी ही वहीं वस्तु दिखाई देगी । ये मानवीय प्रतिस्पर्धा अपनेपन पर ही दिखाई देती हे , दूसरों या जिनसे अपना लगाव नहीं होता उनसे हमें कोई फर्क नहीं पडता । मेरा कहने का तात्पर्य है कि आखिर भारत औार पाकिस्तान वास्तव में एक दूसरे के अति प्रिय है या नहीं । आपके सामने है सब कुछ आप अपने मनौविज्ञान से विचार कर मुझे भी बतावें कि क्या बात है हम दो देशों के बीच प्रेम या घृणा ? क्या है ये अपनापन या अनजानापन !

रविवार, 3 अप्रैल 2011

संकल्प के धनी आज के चाणक्य योगराज सिंह







भारत ने विश्व कप क्रिकेट 2011 को जीत कर यह दिखा दिया है कि क्र्रिकेट के मैदान मे उससे बढकर कोई नही है । भारतीय टीम के खिलाडियों ने यह गौरव 28 साल बाद पुनः प्राप्त किया हैं जिसे 1983 में कपिल देव के नैतृत्व में भारत ने प्राप्त किया था।
लेकिन मुझे एक व्यक्ति की पीडा ने यह ले लिखने को प्रेरित किया जिस समय टी वी पर भारत की जीत के कशीदे पढे जा रहे थे और वे एक चैनल पर अपनी पीडा बयां कर रहे थे जिन्होने पिछले 30 सालों से अपने जज्बातों को सहेज कर रखा और खुद नहंी तो अपने बेटे को इस लायक बना दिया कि उस बेटे ने उनका सपना पूरा किया । जज्बातों को 30 साल तक एक चिंगारी की तरह जलाए रखना हर किसी के वश का नहीं होता । बाते कही जाती है और समय के मल्हम से उनको भर दिया जाता है लेकिन विश्व कप खेलने की तम्मना ने उन्हे इतना मजबूत बना दिया कि वे खुद तो उम्र के पडाव पर इस कप के लिए भारत की ओर से खेल नहीं सके लेकिन उन्होने अपना ख्वाब अपने बेटे में ढूंढा और उन्हे इसके लिए 30 साल का इंतजार करना पडा ।



आपने चाणक्य का नाम तो सुना ही होगा और उसके अपमान की कहानी भी जानते होगे । चलिए थोडी सी उस कहानी को याद कर लेते है । चाणक्य राजा घनानन का दरबारी था एक बार घनानन ने चाणक्य का अपमान कर उसे अपने दरबार से निकाल दिया । चाणक्य ने इस अपमान के लिए अपनी शिखा पर गांठ लगाते हुए प्रण किया कि वह इस अपमान का बदला जरूर लेगा । समय बीतता गया । लोग चाणक्य का किया गया अपमान भूल गये लेकिन चाणक्य ने घनानन को सीख देने के लिए एक शिष्य तैयार किया उसे बचपन से ही सब कामों में निपुण किया । जो बडा होकर राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम से विख्यात हुआ ।
बस ऐसी ही घटना आज से करीब 30 पहले घटित हुई थी लोग भूल गये लेकिन चाणक्य नहीं भूला । अपनी गृहस्थी से परिवार से दूर हो गया । अपने यौवन को उसने चन्द्रगुप्त को गढने में खो दिया उसे एक सनकी पिता की जिद पर अड कर परिवार के विरूद्ध जाकर काम करने जैसे कई कठोर कदम उठाने पडे लेकिन उसने परवाह नहीं की ।अपने मन में विश्व कप न खेल पाने की हसरत उसने अपने बेटे मे ढूढी और उसे बना दिया चन्द्रगुप्त मौर्य । हा जनाब कुछ समझे । मै आज के किस चाणक्य की बात कर रहा हू । चलो मै ही बता देता हू । वो शक्ख्यित है योगराज सिंह युवराज सिंह के पिता । जिन्होने अपने 30 साल केवल और केवल युवराज सिंह को तैयार करने में बिताए इस बीच उन्हे अपने परिवार समाज और न जाने कितने लोगो से कई तरह के गिले शिकवे रहे । कोई आश्चर्य नहीं खुद उनके बेटे ने भी नहीं सोचा होगा कि उसके पिता के दिल में कौनसी आग सुलग रही है जो उसे गढती ही जा रही है थकने का नाम ही नही ले रही ।



योगराज सिंह जी ने भारत के विश्व कप जीतने के बाद यह राज उजागर किया कि उन्होने सिर्फ एक शख्स के बडबोले पन के कारण यह आग अपने सीने में दबाए रखी । जिसने उन्हें अपने अपने तकदीर और नसीब से ही विश्व कप में खेल पाने की नसीहत दी थीं आपको याद होगा कि योगराज सिंह जी भी क्रिकेट के अच्छे खिलाडी है । 1982 में विश्व कप के लिए खिलाडियों का चयन होना था। योगराज सिंह भी उस दौड मे थे योग्य और डिजर्व होने के बाद भी उनका चयन नहीं हुआ तो उन्हे निराशा तो होनी ही थी उनके स्थान पर किसी अन्य खिलाडी का चयन हो गया और उनका विश्व कप में खेलने का ख्वाब टूट गया ।



उस पर किसी ने उन्हें अपने अपने भाग्य की नसीहत भी दे दी । लेकिन योगराज सिंह ने उसी दिन से ये प्रण ले लिया कि वे विश्व कप में खेलेगे लेकिन ये उनका दुभाग्र्य कहे या सौभाग्य कि आने वाले सालों में उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका । बाद में उन्हे उम्र के कारण अपना यह सपना पूरा होता नहीं दिखा तो उन्होने अपने सपने को अपने पुत्र युवराज सिंह में देखना शुरू कर दिया और उसे इस हद तक तैयार कर दिया कि आज उसका भारतीय क्रिकेट टीम में क्या स्थान है सब जानते हैं । आप शायद ये नहीं जानते हो कि उनके इस संकल्प में उन्हे अपनी पत्नी तक का साथ नहंी मिल सका । वे स्वयं कह रहे थे कि उन्होने युवराज से उसका बचपन छिन लिया लेकिन अब मै उसे बहुत प्यार और आर्शीवाद देना चाहता हू कि उसने मेरे सपने को साकार कर दिया इसमें उनका छिपा दर्द्र सहज ही समझा जा सकता है।



वे अपने माता पिता को भी याद कर चैनल पर बता रहे थे कि आज उनकी आत्मा बहुत खुश हो रही होगी कि उनका बेटा नही तो उनका पोता तो वो मुकाम पा सका जिसकी तम्मना वे अपने साथ ले गये । मुझे नमन करने को दिल करता है उसे शख्सियत को जिसने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया देश को एक अच्छा खिलाडी देने में । यदि सभी इसी तरह संकल्प वादी हो जाए तो ऐसे देश के लोगो को कौन हरा सकता है चाहे वो खेल का मैदान हो या फिर बिजनेस का क्षेत्र।



कितने लोग है हमारे देश में इस तरह का संकल्प लेकर आग बढने वाले । कितनी बडी बात है कि योगराज सिंह ने बडी ही विनम्रता से कहा कि आज मै उस शख्स को धन्यवाद देता हू कि यदि वह ऐसा नही कहते तो शायद देश को युवराज सिंह जैसा खिलाडी नहीं मिलता । एक ही शब्द में 30 साल की बंधी शिखा की गांठ ख्ुल गई और मन मे छिपा रखी आग का परिशमन भी हो गया । पारिवारिक रूप से योगराज सिंह और उनकी पत्नी भले ही एक साथ नहीं रहते हो लेकिन फिर भी इस शख्स ने युवराज सिंह को अपना यह विश्व कप अपनी मां को समर्पित करने की सलाह देकर कर यह साबित कर दिया है कि वे कितने सहिष्ण भी है । उनकी आंखे बयां कर रही थी जैसे उन्होने अपना मिशन पूरा कर लिया हो और अब कोई ख्वाहिश ही बाकी न रही हो । गर्व होना चाहिए युवराज सिंह को अपने पिता पर कि वह एक ऐसे पिता के पुत्र है जो संकल्प लेते है तो पूरा करते है और फिर सहदय से बिना माफी मांगे माफ भी कर देते है । वरना आज के युग में बदले की भावना और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड सी लगी हुई हैं



मै यह नहीं जानता कि योगराज सिहं को ये शब्द किसने कहे कि उन्हे 30 साल की कठोर तपस्या करनी पडी और न ही मै यह जानना चाहता कि वह कौन है । जिस किसी ने भी जो कुछ भी कहा उसमें उनका अपमान हुआ या नहीं । ये ज्यादा मायने नहीं रखते बल्कि ये ज्यादा मायने रखता है कि आज कितने लोग है हमारे देश में जो इस तरह का संकल्प लेकर देश को कुछ देते है । जरूरत केवल अरबों की आबादी के देश में ऐसे हजारों लोगों की ही है जो योगराज सिंह जैसा संकल्प लेकर उसे पूरा कर सके । लेकिन उसमें ये भी ख्याल रखियेगा कि स्वयं की आहूति देनी पडती है जनाब ।