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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

क्या है भारत पाकिस्तान का मनौविज्ञान

विश्व कप क्रिकेट में भारत के पाकिस्तान से सेमीफाइनल मैच मोहाली में जीतने के बाद भारत के लोग ये मान कर चल रहे है जैसे भारत ने विश्व कप क्रिकेट का फाइनल मैच जीत लिया हो।भारतीय किक्रेट टीम ने पाकिस्तान को हरा कर जैसे विश्व कप जीत लिया हो अभी देश में ऐसा ही माहोल हैं । क्यों भारतीय जन मानस को ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान के हार जाने के बाद अब कुछ जीतना बाकी रहा ही न हों । ये मानसिकता क्यों है कि पाकिस्तान को हरा दिया इसका मतलब हमने सब कुछ जीत लिया । ये मनोविज्ञान न केवल भारतीयों का है बल्कि यही स्थिति पाकिस्तान के लोगो की भी है । पाकिस्तान की जनता भी अपनी टीम से यही अपेक्षा रखती है कि और किसी टीम से भले ही हार जाए लेकिन भारत की टीम से उसके देश का जीतना जरूरी हैं ।

दोनो देशों के जनमानस का ऐसा मनोविज्ञान क्यों है? समझ मे नहीं आता । करो या मरो का नारा इन टीमों के बीच होने वाले मैच मे ही क्यों हावी रहता है? हम एक कमजोर टीम से हार जाए तो देश मे कोई इतना बवाल या जिज्ञासा नहीं होती जितनी कि पाकिस्तान से हार जाने पर । वास्तव में हम पाकिस्तान को अपना सबसे बडा प्रतिद्वन्द्वि मानते है और पाकिस्तान हमें अपना प्रतिद्वन्द्वि मानता है । दोनो देशों के लोगो की यही प्रतिद्वन्द्विता ही इसके मूल कारण मे है ।

हाॅलाकि श्रीलंका से फाइनल जीतने पर ही हम विश्व कप क्रिकेट के सिरमौर होगे ये बात जानते हुए भी लोगों में जितना क्रेज पाकिस्तान के साथ खेले गए सेमीफाइनल में था उतना श्रीलंका के साथ फाइनल के लिए भी नहीं है ं हांलाकि हर भारतीय चाहता है कि इस बार विश्व कप भारत जीते लेकिन यदि श्रीलंका भी जीतती है तो भारतीयों को इतना दुख नहीं होगा जितना कि पाकिस्तान से हारने पर होता ।

हांलाकि मनौवैज्ञानिक ही इसका अच्छा विश्लेषण कर सकते है लेकिन आम धारणा यही होती है कि हमारे बराबरी का और हमारा कोई विशेष प्रिय आगे बढता है तो मन में एक भावना जाग्रंत होती है किवह प्रिय हमारे से आगे नहीं निकलना चाहिए। शायद हमारे बीच भी यही धारणा काम करती है । इसका अर्थ तो यही हुआ न कि हम कहीं न कहीं एक दूसरे को चाहते है लेकिन ईष्र्या की भावना हमें यह प्रदर्शित करने से रोक रही है।

देखिए अपने आस पास के वातावरण से ही ले तो हम अपने पडौसी की सुख सुविधा नहीं सहन कर सकते यदि उसके यहां कोई चीज आती है तो हमारे पास भी वह चीज होनी चाहिए । ये भी तो ईष्र्या ही है ना ं यही नहीं दो भाइ्र्र अलग अलग अपना परिवार चला रहे है लेकिन एक के यहां कोई नई वस्तु आती है तो दूसरे के यहां भी आपकों जल्दी ही वहीं वस्तु दिखाई देगी । ये मानवीय प्रतिस्पर्धा अपनेपन पर ही दिखाई देती हे , दूसरों या जिनसे अपना लगाव नहीं होता उनसे हमें कोई फर्क नहीं पडता । मेरा कहने का तात्पर्य है कि आखिर भारत औार पाकिस्तान वास्तव में एक दूसरे के अति प्रिय है या नहीं । आपके सामने है सब कुछ आप अपने मनौविज्ञान से विचार कर मुझे भी बतावें कि क्या बात है हम दो देशों के बीच प्रेम या घृणा ? क्या है ये अपनापन या अनजानापन !

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