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रविवार, 3 अप्रैल 2011

संकल्प के धनी आज के चाणक्य योगराज सिंह







भारत ने विश्व कप क्रिकेट 2011 को जीत कर यह दिखा दिया है कि क्र्रिकेट के मैदान मे उससे बढकर कोई नही है । भारतीय टीम के खिलाडियों ने यह गौरव 28 साल बाद पुनः प्राप्त किया हैं जिसे 1983 में कपिल देव के नैतृत्व में भारत ने प्राप्त किया था।
लेकिन मुझे एक व्यक्ति की पीडा ने यह ले लिखने को प्रेरित किया जिस समय टी वी पर भारत की जीत के कशीदे पढे जा रहे थे और वे एक चैनल पर अपनी पीडा बयां कर रहे थे जिन्होने पिछले 30 सालों से अपने जज्बातों को सहेज कर रखा और खुद नहंी तो अपने बेटे को इस लायक बना दिया कि उस बेटे ने उनका सपना पूरा किया । जज्बातों को 30 साल तक एक चिंगारी की तरह जलाए रखना हर किसी के वश का नहीं होता । बाते कही जाती है और समय के मल्हम से उनको भर दिया जाता है लेकिन विश्व कप खेलने की तम्मना ने उन्हे इतना मजबूत बना दिया कि वे खुद तो उम्र के पडाव पर इस कप के लिए भारत की ओर से खेल नहीं सके लेकिन उन्होने अपना ख्वाब अपने बेटे में ढूंढा और उन्हे इसके लिए 30 साल का इंतजार करना पडा ।



आपने चाणक्य का नाम तो सुना ही होगा और उसके अपमान की कहानी भी जानते होगे । चलिए थोडी सी उस कहानी को याद कर लेते है । चाणक्य राजा घनानन का दरबारी था एक बार घनानन ने चाणक्य का अपमान कर उसे अपने दरबार से निकाल दिया । चाणक्य ने इस अपमान के लिए अपनी शिखा पर गांठ लगाते हुए प्रण किया कि वह इस अपमान का बदला जरूर लेगा । समय बीतता गया । लोग चाणक्य का किया गया अपमान भूल गये लेकिन चाणक्य ने घनानन को सीख देने के लिए एक शिष्य तैयार किया उसे बचपन से ही सब कामों में निपुण किया । जो बडा होकर राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम से विख्यात हुआ ।
बस ऐसी ही घटना आज से करीब 30 पहले घटित हुई थी लोग भूल गये लेकिन चाणक्य नहीं भूला । अपनी गृहस्थी से परिवार से दूर हो गया । अपने यौवन को उसने चन्द्रगुप्त को गढने में खो दिया उसे एक सनकी पिता की जिद पर अड कर परिवार के विरूद्ध जाकर काम करने जैसे कई कठोर कदम उठाने पडे लेकिन उसने परवाह नहीं की ।अपने मन में विश्व कप न खेल पाने की हसरत उसने अपने बेटे मे ढूढी और उसे बना दिया चन्द्रगुप्त मौर्य । हा जनाब कुछ समझे । मै आज के किस चाणक्य की बात कर रहा हू । चलो मै ही बता देता हू । वो शक्ख्यित है योगराज सिंह युवराज सिंह के पिता । जिन्होने अपने 30 साल केवल और केवल युवराज सिंह को तैयार करने में बिताए इस बीच उन्हे अपने परिवार समाज और न जाने कितने लोगो से कई तरह के गिले शिकवे रहे । कोई आश्चर्य नहीं खुद उनके बेटे ने भी नहीं सोचा होगा कि उसके पिता के दिल में कौनसी आग सुलग रही है जो उसे गढती ही जा रही है थकने का नाम ही नही ले रही ।



योगराज सिंह जी ने भारत के विश्व कप जीतने के बाद यह राज उजागर किया कि उन्होने सिर्फ एक शख्स के बडबोले पन के कारण यह आग अपने सीने में दबाए रखी । जिसने उन्हें अपने अपने तकदीर और नसीब से ही विश्व कप में खेल पाने की नसीहत दी थीं आपको याद होगा कि योगराज सिंह जी भी क्रिकेट के अच्छे खिलाडी है । 1982 में विश्व कप के लिए खिलाडियों का चयन होना था। योगराज सिंह भी उस दौड मे थे योग्य और डिजर्व होने के बाद भी उनका चयन नहीं हुआ तो उन्हे निराशा तो होनी ही थी उनके स्थान पर किसी अन्य खिलाडी का चयन हो गया और उनका विश्व कप में खेलने का ख्वाब टूट गया ।



उस पर किसी ने उन्हें अपने अपने भाग्य की नसीहत भी दे दी । लेकिन योगराज सिंह ने उसी दिन से ये प्रण ले लिया कि वे विश्व कप में खेलेगे लेकिन ये उनका दुभाग्र्य कहे या सौभाग्य कि आने वाले सालों में उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका । बाद में उन्हे उम्र के कारण अपना यह सपना पूरा होता नहीं दिखा तो उन्होने अपने सपने को अपने पुत्र युवराज सिंह में देखना शुरू कर दिया और उसे इस हद तक तैयार कर दिया कि आज उसका भारतीय क्रिकेट टीम में क्या स्थान है सब जानते हैं । आप शायद ये नहीं जानते हो कि उनके इस संकल्प में उन्हे अपनी पत्नी तक का साथ नहंी मिल सका । वे स्वयं कह रहे थे कि उन्होने युवराज से उसका बचपन छिन लिया लेकिन अब मै उसे बहुत प्यार और आर्शीवाद देना चाहता हू कि उसने मेरे सपने को साकार कर दिया इसमें उनका छिपा दर्द्र सहज ही समझा जा सकता है।



वे अपने माता पिता को भी याद कर चैनल पर बता रहे थे कि आज उनकी आत्मा बहुत खुश हो रही होगी कि उनका बेटा नही तो उनका पोता तो वो मुकाम पा सका जिसकी तम्मना वे अपने साथ ले गये । मुझे नमन करने को दिल करता है उसे शख्सियत को जिसने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया देश को एक अच्छा खिलाडी देने में । यदि सभी इसी तरह संकल्प वादी हो जाए तो ऐसे देश के लोगो को कौन हरा सकता है चाहे वो खेल का मैदान हो या फिर बिजनेस का क्षेत्र।



कितने लोग है हमारे देश में इस तरह का संकल्प लेकर आग बढने वाले । कितनी बडी बात है कि योगराज सिंह ने बडी ही विनम्रता से कहा कि आज मै उस शख्स को धन्यवाद देता हू कि यदि वह ऐसा नही कहते तो शायद देश को युवराज सिंह जैसा खिलाडी नहीं मिलता । एक ही शब्द में 30 साल की बंधी शिखा की गांठ ख्ुल गई और मन मे छिपा रखी आग का परिशमन भी हो गया । पारिवारिक रूप से योगराज सिंह और उनकी पत्नी भले ही एक साथ नहीं रहते हो लेकिन फिर भी इस शख्स ने युवराज सिंह को अपना यह विश्व कप अपनी मां को समर्पित करने की सलाह देकर कर यह साबित कर दिया है कि वे कितने सहिष्ण भी है । उनकी आंखे बयां कर रही थी जैसे उन्होने अपना मिशन पूरा कर लिया हो और अब कोई ख्वाहिश ही बाकी न रही हो । गर्व होना चाहिए युवराज सिंह को अपने पिता पर कि वह एक ऐसे पिता के पुत्र है जो संकल्प लेते है तो पूरा करते है और फिर सहदय से बिना माफी मांगे माफ भी कर देते है । वरना आज के युग में बदले की भावना और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड सी लगी हुई हैं



मै यह नहीं जानता कि योगराज सिहं को ये शब्द किसने कहे कि उन्हे 30 साल की कठोर तपस्या करनी पडी और न ही मै यह जानना चाहता कि वह कौन है । जिस किसी ने भी जो कुछ भी कहा उसमें उनका अपमान हुआ या नहीं । ये ज्यादा मायने नहीं रखते बल्कि ये ज्यादा मायने रखता है कि आज कितने लोग है हमारे देश में जो इस तरह का संकल्प लेकर देश को कुछ देते है । जरूरत केवल अरबों की आबादी के देश में ऐसे हजारों लोगों की ही है जो योगराज सिंह जैसा संकल्प लेकर उसे पूरा कर सके । लेकिन उसमें ये भी ख्याल रखियेगा कि स्वयं की आहूति देनी पडती है जनाब ।

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