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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

पेट्ोल के दामो मे बढोतरी -जनता मे भारी आक्रोश

देश में 13सितम्बर 2011 की आधी रात के बाद पेट्ोल के दामों मे 3 रूपये 14 पैसे प्रति लीटर से बढा दिये गए । जिससे तेल की किमते अलग अलग स्थानो पर लगभग 70 रूपये प्रति लीटर के आस पास पहुच गई कहीं कही तो यह 70 रूपये से 72 रूपये प्रति लीटर के बीच तक पहुच गई है । विभिन्न शहरो में यह मूल्य वृद्धि स्थानीय कर व लेवी पर निर्भर करती है । सरकार ने जून 2009 से पेट्ोल डीजल से सरकारी नियंत्रण हटा दिया था तथा हर 15 दिनो मे समीक्षा किये जाने की बात कही थी। तब से लेकर अब तक तेल कम्पनियां ही अन्तर्राष्ट्ीय तेल की कीमतो के आधार पर इनके दाम निर्धारित करती है ।

पेट्ोल के दामों को बढाने के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल के दाम 110 डालर प्रति बैरल से लेकर 111 डालर प्रति बैरल तक हो जाने के कारण तेल कम्पनियों को दाम बढाने पड रहे है उसके पीछे भी यह और कि इसके बाद भी तेल कम्पनियों को घाटा हो रहा है । सरकार आंखे मूंदे बैठी है और तेल कम्पनियां जनता को लूट रही है यही नहीं इसके कारण मंहगाई बढ रही है जिसके कारण सरकार का विरोध हो रहा है । रेल मंत्री ने भी तेल की कीमतो की बढोतरी की दुहाई देकर रेल किराए मे वृद्धि के संकेत दिए है । जिससे किराए व माल भाडे में वृद्धि अवश्यभावी होगी अतः महगाई और बढेगी । वैसे भी आम आदमी मंहगाई से इतना त्रस्त हो गया है कि उसका जीना दूभर हो गया है ।

       क्या है तेल कम्पनियों की राजनीति आईये एक नजर डालते है । तेल कम्पनियों को जब भी तेल के दामों में वृद्धि करनी होती है तब वे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में तेल की कीमते बढने का समय चुनती है जिससे प्रत्यक्ष रूप से यह आभास हो कि वास्तव मे कीमतों की बढोतरी के कारण तेल के दाम बढाने मजबूरी है लेकिन क्या  सरकार इन तेल कम्पनियों की बैलेन्स शीट नहीं देख रही कि जो तेल कम्पनियां घाटा होने की दुहाई देकर तेल के दामों में बढोतरी को जायज बता रही है वे प्रति वर्ष हजारो करोड का मुनाफा कमा रही है । सामान्य सी बात है जब तेल कम्पनियो को घाटा हो रहा है तो उनकी बैलेन्स शीट भारी मुनाफा क्यों बता रही है । दूसरी बात जब अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमते दिसम्बर 2008  में 46 डालर प्रति बैरल की अपनी न्यूनतम कीमत थी तो हमारे देश मे देश मे पेट्ोल डीजल के दामों मे कोई खास कमी नहीं थी। हांलाकि उस समय तेल के दामो का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता था । मई 2009 में भी अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल के दाम 66 डालर प्रति बैरल के थे । लेकिन मई 2009 के बाद जून 2009 मे सरकार ने पेट्ोल डीजल के दामों को निर्धारित करने का अधिकार तेल कम्पनियो को दे दिया । उसके बाद पेट्ोल डीजल के दाम लगातार बढते ही जा रहे है ।

15 मई 2011 को जब पेट्ोल के दामों मे 5 रूपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई थी तब भी अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमते 110 डालर प्रति बैरल थी और इस बार भी पेट्ोल की कीमते यह कहकर बढाई गई है कि वर्तमान मे कच्चे तेल की अन्तर्राष्ट्ीय कीमते 110111 डालर प्रति बैरल हो गई है इसका अर्थ ये हुआ की 15 मई 2011 से 13 सितम्बर 2011 के बीच कच्चे तेल की कीमतो में कमी आई तभी तो वर्तमान कीमत भी मई 2011 के समान है । प्रश्न यह है कि क्या 15 मई 2011 के बाद जब अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमतों में कमी आई तो क्या तेल कम्पनियों ने पेट्ोल के दामों में कमी कर जनता को राहत प्रदान की ? नहीं उन्होने न तो कमी की और न ही सरकार ने इस ओर ध्यान दिया । वापस तेल की कीमते बढी और अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे रूपये  की कीमत डालर के मुकाबले कम हुई तो तेल कम्पनियों के मुनाफे में कमी आने लगी तो उन्होने रूपये  का अन्तर्राष्ट्ीय अवमूल्यन का बहाना बना तेल की कीमतों में बढोतरी कर दी । लोकतंत्र मे जनता के साथ यह कैसा न्याय है

जब 2008 मे अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे तेल के भाव अपने उच्चतम 147 डालर प्रति बैरल को छू गए थे तब भी हमारे देश में पेट्ोल की दर अधिकतम 50 रूपये 62 पैसे प्रति लीटर थी उस समय नियंत्रण सरकार के हाथ मे था जबकि वर्तमान में अन्तर्राष्ट्ीय बाजार मे कच्चे के दाम 110 डालर प्रति बैरल है तो हमारे देेश मे पेट्ोल 70 रूपये प्रति लीटर या इससे भी अधिक दर पर जनता को मिल रहा है । यहा  प्रश्न है कि क्या हमारी मुद्रा का अन्तर्राष्टृीय बाजार में इतना अवमूल्यन हो गया है कि 147 डालर प्रति बैरल के दाम के समय तो हमें 50 रूप्ये 62 पॅसे प्रति लीटर पैट्ोल मिल रहा था और अब हमें सस्ता होने के बाद भी 70 रू प्रति लीटर से भी ज्यादा देने पड रहे है । यह आकडे स्पष्ट करते है कि पैट्ोलियम कम्पनियां अपने एक निश्चित मुनाफे को स्थिर रखने की बजाय उसे कच्चे तेल के दामों के अनुपात में बढाती जा रही है ।जिससे आम जनता मंहगाई से त्रस्त होती जा रही है ।

ज्ूान 2009 मे पेट्ोल के दाम 40 रू 62 पैसे प्रति लीटर थे जैसे ही सरकारी नियंत्रण हटाया गया वैसे ही पैट्ोल के दामों में जुलाई 2009 मे  4रू प्रति लीटर की बढोतरी कर दाम 44 रू 63 पैसे प्रति लीटर कर दिये गए जबकि 2009 में अन्तर्राष्ट्ीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 70 डालर प्रति बैरल के थे।  सरकारी नियंत्रण हटने के बाद 2009 मे पेट्ोल के दामों में दो बार वृद्धि की र्गइं । 2010 में पेट्ोल के दाम 10 बार बढाए गए। 2010 के प्रारम्भ मे पेट्ोल 44रू 72 पैसे लीटर था जो वर्ष के अन्त तक 55 रू 87 पैसे प्रति लीटर तक पहुंच गया । 2011 में यह चौथी बार वृद्धि की गई है जो 70 से 72 रू प्रति लीटर तक होगी । पिछले 9 माह में पेट्ोल के दामों में 9 रू प्रति लीटर से भी अधिक की वृद्धि की जा चुकी है । वर्तमान में अर्न्राष्ट्ीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 110 डालर प्रति बैरल है । अदाजा लगाईये कि जब 2008 में पेट्ोल के दाम अपने चरम पर थे तब भी पेट्ोल 45 रू 62 पैसे प्रति लीटर पर मिल रहा था अब  110 डालर होने पर भी पैट्ोल 21 रू 22 पैसे प्रति लीटर महंगा मिल रहा है । आखिर क्यों  कौन देगा जनता को जबाव की तेल की कीमतो में कमी के बाद भी हमारे देश मे पेट्ोल क्यों महंगा होता जा रहा है  क्या पेट्ोलियम कम्पनियां जनता व सरकार दोनो को धोखा दे रही है

आइए अब जरा पडौसी देशो में पेट्ोल के दाम क्या है उस पर नजर डाले । पाकिस्तान मे 26 रूपये प्रति लीटर बाग्ला देश मे यह 22 रू नेपाल मे 34 रू म्यमार मे 30 रू क्यूबा मे 19 अफगानिस्तान मे 36 रूपये प्रति लीटर उपलब्ध है । उपलब्ध आकडो यदि सही है तो उसके अनुसार  एक लीटर पेट्ोल की लागत 16 रू 50 पैसे आती है । उस पर केन्द्रीय कर सी एसटी लगभग 12 प्रतिशत सीमा शुल्क लगभग 10 प्रतिशत वैट 4 प्रतिशत व राज्य कर लगभग 8 प्रतिशत  लगाया जाता है । इस प्रकार एक लीटर पेट्ोल की लागत लगभग 23 रू प्रति लीटर आती है । सरकार का मुनाफा तो इसमे शामिल है तो फिर क्या शेष मुनाफा पेट्ोलियम कम्पनियां कमा रही है । यदि इन आंकडो मे सच्चाई है तो सरकार को पेट्ोलियम कम्पनियों की मुनाफाखोरी को रोकना चाहिए तथा जनता को राहत देनी चाहिए । ये आंकडे दर्शाते है कि पेट्ोलियम कम्पनियां 44 रू प्रति लीटर मुनाफा खा रही है । लागत से भी दुगुना लाभ कमा रही है । और फिर भी सरकार के सामने घाटे का रोना रोकर दाम बढाने की स्वीकृति ले रही है । और सरकार आंख मूंदकर उन्हे इसकी अनुमति दे रही है । जो अन्ततः उसके लिए ही भारी साबित होना हैा । एक तरफ ये कम्पनियां घाटे का राग अलाप रही है और दूसरी तरफ इनकी बैलेन्स शीटे भारी मुनाफा दर्शा रही है ।

लोकतांत्रिक सरकार का यह दायित्व है कि वह इस प्रकार की प्रवृतियों पर अंकुश लगाए तथा यदि इसमे कुछ भी सच्चाई हो तो पेट्ोलियम कम्पनियो को अपने मुनाफे को 10 प्रतिशत तक सीमित करने के लिए बाध्य करना चाहिए । ताकि जनता को राहत मिले व महंगाई पर अंकुश लगे वरना यह पेट्ोल की आग इस सरकार को ले डूबेगी ।

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