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रविवार, 11 सितंबर 2011

हमारी खुफिया व जांच एजेन्सियों में तालमेल नहीं

    
दिल्ली हाईकोर्ट विस्फोट के बाद देश में एक बहस छिडी हुंई है कि हमारे देश की खुफिया व जांच एजेन्सिया क्या कर रही है देश में एक के बाद एक विस्फोट होते जाते है और हर बार इस आशा के साथ की अगली बार शायद हमारी ख्ुफिया एजेन्सियां हमें समय पर सर्तक कर दे और निर्दोष लोगो को अपनी जान न गंवानी पडे लेकिन यह हर बार एक दिव्या स्वप्न हो जाता है और आतंककारी अपनी वारदात कर अगले बार फिर निर्दोष लोगो की जान लेने की खुली धमकी देते दिखाई देते है ।

       आपको शायद ज्ञात न हो कि हमारे देश में जितनी इन्टेलीजेन्स एजेन्सियां है उतनी शायद विश्व के किसी देश मे नहीं  हर क्षेत्र पर नजर रखने के लिए हमारे यहां एक न एक एजेन्सी है चाहे वह सुरक्षा सम्बन्धी हो या राजस्व अथवा कर चोरी को रोकने की एजेन्सी । सभी अपने स्तर पर कार्य करती है और उनका क्या परिणाम है कि सुरक्षा एजेन्सिया सुरक्षा के कार्य को ठीक ढंग से नहीं कर पा रही है तो राजस्व की हेराफेरी रोकने हेतु गठित एजेन्सी भू माफियाओं पर प्रतिबन्ध नहीं लगा पा रही है तो कर चोरी रोकने के लिए गठित एजेन्सी के बावजूद हमारे देश में कर चोरी सब देशों से अधिक है । क्या आप जानते है कितनी एजेन्सियां विभिन्न क्षेत्रों मे कार्य कर रही है हमारे देश में  आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि राष्ट्ीय स्तर पर हमारे देश मे कुल 14 एजेन्सिया है जिन पर विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले गलत कार्यो पर नजर रखने का दायित्व है ।

       इन 14 एजेन्सियों मे से 9 एजेन्सियों का कार्य सिर्फ हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना है । ये है:- नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेन्सी (एन आई ए) सेन्ट्ल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन (सी बी आई) रिसर्च एण्ड एनालेसिस विंग (रॉ) इन्टेलीजेन्स ब्यूरो (आई बी ) डिफेन्स इन्टेलीजेन्स एजेन्सी (डी आई ए) सिगनल्स इन्टेलीजेन्स डाईरेक्ट्ेट (एस आई डी) डायरेक्ट्ेट आफ एयर इन्टेलीजेन्स (डी ए आई ) डायरेक्ट्ेट आफ नेवी इन्टेलीजेन्स (डी एन आई ) ज्वाईट सिफेर ब्यूरो (जे सी बी ) । इन एजेन्सियों के मौजूद होते हुए भी हमारे देश में आतंककारी घटनाए होती है और आतंककारी अपनी घटना को अंजाम देकर बेखौफ निकल जाते है । क्या कारण है कि ये एजेन्सियां अपना कार्य पूरा नहीं कर पा रही । इसका कारण है इन सबमें किसी तरह का तालमेल नहीं है । सब अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती है । एक केन्द्रीय एजेन्सी न होने के कारण ये अपने मातहत विभाग तक ही सीमित रह जाती है । जिसके कारण जो प्रभावी कार्यवाही खुफिया रिर्पोटो पर होनी चाहिए वह नहीं हो पाती और आतंककारी अपनी  वारदात को अजंाम देकर साफ बच निकलते है ।

       देश मे अभी बहस चल रही है कि इन आतंककारी घटनाओं को कैसे रोका जाए । निर्दोष जनता के जीवन की रक्षा कैसे की जावे । यह तभी संभव है कि इन सभी एजेन्सियों में आपसी तालमेल हो । वर्तमान मे हो ये रहा है कि डिफेन्स इन्टेलीजेन्स एजेन्सी अपनी रिर्पोट डिफेन्स डायरेक्टर को सौप कर निश्चिन्त हो जाती है और सिगनल्स इन्टेलीजेन्स डाईरेक्ट्ेट (एस आई डी) अपने मुख्यालय को रिर्पोट कर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती है डायरेक्ट्ेट आफ एयर इन्टेलीजेन्स (डी ए आई ) डायरेक्ट्ेट आफ नेवी इन्टेलीजेन्स (डी एन आई ) अपने अपने महानिदेशकों को अपनी रिर्पोट सौप कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती है । आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी की रिपोर्टस को यदि एक ही एजेन्सी सग्रहित कर उसी के अनुसार अपनी कार्य प्रणाली व नीति निर्धारित करें तो एक सेटअप विकसित हो सकता है तथा पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावी किया जा सकता है ।

       लेकिन हमारे देश में हो यह रहा है कि जो अधिकारी इन एजेन्सियों से रिटायर्ड हो रहे है उनके अनुभवों का लाभ नहीं लिया जा रहा । ऐसे अधिकारियों के अनुभवों के आधार पर कार्य योजना बनाई जा सकती है क्योंकि वे जानते है कि उनके  पद पर रहते हुए  उन्होने किस प्रकार की कमियां महसूस की तथा उन्हे दूर कैसे किया जा सकता है । आज हो ये रहा है कि उनके अनुभवों का कोई लाभ नहीं लिया जा रहा । नीति निर्धारक ऐसे लोग बन गए है जिनकी या तो राजनैतिक पहुंच है या जिन्हे इन क्षेत्रों का ज्यादा अनुभव नहीं है । उदाहरण के लिए एक आई ए एस जो सरकार का चहेता है और वह प्रशासनिक क्षेत्र मे ही अधिक रहा है तो भी उसे इसलिए ऐसी एजेन्सी का मुखिया बना दिया जाता है  जिसमें उसे उसकी विशेषज्ञता हासिल नहीं है । आवश्यकता इस बात है कि देश की सुरक्षा सम्बन्धी एजेन्सी के मुखिया या सदस्य मनोनीत किये जाने से पहले उसके अनुभव उसकी विशेषज्ञता को वरियता दी जावे लेकिन हमारे देश में इसके विपरित होता है और यही कारण है कि अनुभवों का लाभ देश को नहीं मिल पाता और देश की सुरक्षा खतरे मे पड जाती है या फिर निर्दोष लोगो को अपनी जान गंवानी पडती है  

       यदि सरकार वास्तव में देश से आतंकवाद का सफाया करना चाहती है तो उसे अमेरिका की एफ बी आई की तरह ही एक ऐसी एजेन्सी का गठन करना होगा जो इन सभी एजेन्सियों की रिर्पोट पर गहन चिन्तन करें तथा उन्हे उसी अनुरूप निर्देशित भी करें देश की सुरक्षा व्यवस्था से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार न हो। राजनैताओं को सुरक्षा के मामले में अपने आप पर अंकुश लगाना होगा। अपने चहेतों की नियुक्तियों की बजाय योग्य व अनुभवी लोगो को इन एजेन्सियों में लगाना होगा । तभी उनकी स्वयं की तथा आम नागरिक की सुरक्षा संभव हो सकेगी । सरकार को बेशर्म होकर निर्दोष लोगो की जान लेकर जिम्मेदारी लेने वाले संगठनों से जुडे लोगो के खिलाफ भी बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्यवाही करनी होगी । आज  कई संगठन तो ऐसे है जो मात्र पोपुलर होने के लिए जानबूझ कर जिम्मेदारी लेते है  इसका कारण है ऐसे संगठनों के खिलाफ कठोर कार्यवाही का अभाव । यही नहीं जिन लोगों को सजा हो जाने के बाद भी उन्हे छुडाने के लिए यदि किसी घटना को अंजाम दिया जाता है तो उन जेल में बंद अपराधियों पर एक और मुकदमा चलाया जाना चािहए जिसमें उन्हें केवल और केवल फॉसी की सजा ही देने का प्रावधान हो । यदि उम्र कैद की सजा पा रहे कैदी के लिए आतंकवाद की कार्यवाही की जावे तो उसे फॉसी ही दी जाने का प्रावधान हो और यदि फॉसी की सजा वाले के लिए ऐसा किया जावे तो उसे तुरंत ही फॉसी पर लटका दिया जाना चाहिए बिना किसी सुनवाई के । ऐसे कठोर कानून और तालमेल वाली एजेन्सी के गठन के बाद ही इस देश से आतंक का साया समाप्त किया जा सकता है ।

       जनता को भी जागरूक होकर अपनी सक्रियता दिखानी होगी । केवल सरकार पर दोष मढकर हम सुरक्षित नहीं रह सकते  । जान तो आम आदमी की जा रही है फिर उसमे हम और आप भी तो हो सकते है । फिर हम क्यों नही जागरूक हो रहे हम  हमारा कर्तव्य समझे कि हम अपने आसपास किसी भी अनजान व्यक्ति के बारे में पुलिस को इतिला करें आखिर हमारी जान का जो सवाल है हमारी लापरवाही ही तो हमें जान से हाथ धोने के लिए जिम्मेदार है । फिर क्यों हम अपनी जान को सुरक्षित नहीं रखना चाहते क्यों सरकार पर छोडे कि वह हमारी सुरक्षा करें । देश ने दो प्रधानमंत्री खोऐ  देश चलता रहा लेकिन इसकी कीमत वह परिवार ही जानता है जिसने अपने परिजन को खोया है  हम केवल और केवल संवेदना ही प्रकट कर सकते है इससे ज्यादा नही  इसी तरह धमाकों में मारे गए निर्दोषों के लिए हमारी संवेदना ही हो सकती है लेकिन यही हमारे किसी प्रिय के साथ घटित हो तो उन संवेदनाओं को क्या मूल्य जिनसे हमारा प्रिय वापस नहीं आ सके । इसलिए भविष्य के लिए हमें संकल्प लेना होगा कि हम अपने कर्तव्यों का पूरा वहन करेगे । हमारी लापरवाही या सूचना के अभाव मे किसी घर का दीपक न बुझे ।




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