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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम - जनता का समर्थन, राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पार्टीया के दोहरे चरित्र


अन्ना हजारे के समर्थन में आज देश भर से हजारों लोगों ने अपना समर्थन व्यक्त करने हेतु उनके जन लोकपाल बिल को सरकार द्वारा मानने हेतु दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन किये । कहीं मशाल जुलूस  तो कहीं केंडल लाईट प्रदर्शन कर लोगो ने अन्ना की गिरफ्तारी का न केवल विरोध किया बल्कि उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम मे उनके साथ होने का संदेश दिया । हांलाकि सरकार को देश भर मे हो रहे प्रदर्शनों में जनता की भावना को समझ लेना चाहिए कि आखिर जनता चाहती क्या है सरकार को जनता की भावनाओं को समझते हुए अपने द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल में संशोधन कर लेना चाहिए इससे एक तो जनता को यह सुकुन मिलेगा कि सरकार जनता की भावना को संवेदनशीलता से लेती है और उसने उसी अनुरूप परिवर्तन कर जनता की भावना का सम्मान किया है । दूसरी तरफ भाजपा इस आंदोलन की आड मे राजनीति पर उतर आई है और उसके बडे बडे नेता भी मशाल जुलूस में शामिल होकर जनता के सैलाब को देखते हुए अन्ना के साथ खडी दिखाई देती है और जनता को यह प्रदर्शित करने का प्रयास कर रही है कि वह अन्ना के साथ है जबकि  वास्तविकता यह है कि जब अन्ना ने अपने लोकपाल बिल के समर्थन के लिए भाजपा नेताओं से सम्पर्क किया था तो किसी ने भी उन्हे यह आश्वासन नही दिया था कि वे उनके बिल का संसद मे समर्थन करेंगे । और आज जब उन्हे अन्ना के साथ जनता का समर्थन दिखाई दे रहा है तो वे मशाल जुलूस निकाल कर जनता को गुमराह कर रहे है । इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा भी अब अवसरवादी पार्टी बन गई है जो मुद्दों व सिद्धांतों की लडाई छोड कर अवसर देख कर अपनी व्यूह रचना गढती है ।

        यदि वास्तव मे भाजपा अन्ना के जन लोकपाल बिल का समर्थन करती है तो इस आंदोलन से पूर्व अन्ना ने पार्टी से सम्पर्क किया था तब उन्होने अन्ना हजारे को कोई ठोस आश्वासन क्यों नहीं दिया भाजपा जो आज अन्ना के पक्ष मे मशाल जुलूस निकाल रही है वह चाहती तो अन्ना के लोकपाल बिल को अपनी तरफ से संसद में प्रस्तुत कर सकती थीं अथवा कोई भी संसद सदस्य अपनी ओर से अन्ना के जन लोकपाल बिल को अपनी तरफ से प्रस्तुत कर सकता था किन्तु न तो किसी संसद सदस्य ने और न ही किसी वामदल तृणमूल कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी जनता दल या अन्य किसी दल ने इसे अपना विधेयक बनाकर पेश करना उचित समझा। जनता को यह समझ लेना चाहिए कि हमारे संसद सदस्य  व पार्टीयां किस तरह भीड देखकर अपना चेहरा बदलती है। आज जब अन्ना के साथ जनता का समर्थन दिखाई दे रहा है तो वे बिना मांगे ही समर्थन देकर अन्ना को यह दिखाना चाहती है कि उनके साथा है लेकिन अन्ना हजारे एवं जनता को इन चेहरों व पार्टीयों के चेहरों को समझ लेना चाहिए कि ये अवसरवादी ताकते वास्तव मे मन से उनके साथ  नहीं है ये वे लोग है तो अवसर की तलाश मे रहते है और अवसर मिलते ही अपना रंग बदल लेते है । आज जनता व अन्ना हजारे की टीम को समझ लेना चाहिए कि ये अवसरवादी ताकते कहीं अपना राजनीतिक फायदा बटोर कर जनता को ढेंगा न  दिखा दे । क्योंकि जो भाजपा आज मशाल जुलूस निकाल कर समर्थन दिखा रही है वह केवल राजनीतिक लाभ ही लेना चाहती है उसे प्रभावी जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं है । उसे सरकार को पटकनी देनी है और उसे जनता का मंच मिल गया है जिसे वह भुनाने का प्रयास कर रही है लेकिन जनता को ऐसी पार्टी व लोगो से सावधान रहना चाहिए कि कहीं वे इसका नाजायज फायदा उठाकर श्रेय अपने सिर लेने का प्रयास न करें।

        आज जनता भ्रष्ट्चार से वास्तव मे तंग आ चुकी है जनता हर उस व्यक्ति के साथ है जो उसे इस भ्रष्ट्चार से मुक्ति दिलाए जनता को अन्ना हजारे के रूप में ऐसा व्यक्तित्व दिखाई दिया है जो उसे इससे मुक्ति दिला सकता है  यदि इससे सरकार दिला सकती है तो वह उसके साथ भी हो सकती हैा यदि सरकार को ये लगता है कि उसके द्वारा संसद में पेश लोकपाल विधेयक प्रभावी है तो उसे जनता के बीच इसका प्रचार करना चाहिए तथा अन्ना के जन लोकपाल बिल से भी बेहतर होने का प्रमाण जनता के बीच रखना चाहिए । लेकिन सरकार जानती है कि उसके द्वारा प्रस्तुत बिल में वह नहीं है जो जनता चाहती है ।इसीलिए वह लोकपाल बिल का खुलासा नहीं कर रहीं । खोट सभी राजनीतिक दलों में है । उनकी कथनी और करनी में अंतर है । यदि राजनीतिक दल चाहे तो सरकारी लोकपाल विधेयक में संशोधन प्रस्ताव भी पेश करती है लेकिन संसद मे वे ऐसा नही कर रही  और जनता की मजबूरी ये है कि अपने द्वारा चुने गए सांसदों के अलावा किसी अन्य रास्ते से जन लोकपाल विधेयक पारित नहीं करा सकती ।  देखिए जनता को ये राजनीतिक दल किस तरह बेवकूफ बना रहे है एक तरफ जनता के मंच पर आकर यह प्रदर्शित कर रहे है कि वे जनता के साथ है जबकि संसद मे वे न तो अपनी पार्टी की ओर से और न ही प्र्राइंवेट विधेयक की प्रस्तुत कर रहे है और न ही सरकारी लोकपाल विधेयक की जो प्रतियां उन्हे मिली है उसमें कोई संशोधन सुझाव ही सरकार को दे रहे है ।

        उनका उद्दश्य केवल आगामी चुनावों में फायदा लेना है ताकि चुनावों के वक्त ये पार्टीया जनता को यह कह सके कि उस समय हम जनता के साथ थे तत्कालीन सरकार ने जन लोकपाल बिल पास नहीं कराया । हमारी इसमें कोई गलती नहीं है । हमें और हमारी पार्टी को वोट दिजिए  लेकिन अब भारतीय जनता को भी जागरूक होना होगा तभी ऐसे अवसरवादियों को मुंह तोड जबाव दिया जा सकेगा । उनसे जनता पूछे कि आप व आपकी पार्टी कहां थी जब भ्रष्ट्ाचार के खिलाफ पेश किये जाने वाले जन लोक पाल विधेयक को लेकर अन्ना हर पार्टी के पास गए थे और उनसे निवेदन किया था कि आप संसद में इस विधेयक को पास करावे तब आपने क्या किया  अन्ना हर पार्टी के दरवाजे से खाली लौटे थे। किसी ने भी ठोस आश्वासन नहीं दिया था। जनता को अपनी भूलने की आदत छोडनी होगी अन्यथा ये राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पार्टीया जनता को हर बार ठगती रहेगी । अन्ना और उसकी टीम को भी समझना चाहिए कि जो काम संसद कर सकती है वह जनता नहीं कर सकती क्योंकि जनता ने संसद में अपने प्रतिनिधी भेजे है वे ही किसी कानून को बना सकते है  और कोई नहीं । हा जनता का दबाव देखकर ये जन प्रतिनिधी संसद में जन लोकपाल बिल की वकालत कर सकते है और उसे पारित करा सकते है । इसके लिए अन्ना और उसकी टीम को संसद के प्रत्येक सदस्य को(लोकसभा के 525 व राज्यसभा के 200 सदस्य या जितने भी है उन सबको) अपने जन लोकपाल बिल की प्रति देनी चाहिए और उस पर उनकी राय लिखित में लेकर सरकार को वह राय भेजनी चाहिए इससे दो फायदे होगे एक तो प्रत्येक संसद सदस्य का चेहरा सामने आ जाएगा कि वे जन लोकपाल बिल के कितने पक्षधर है और दूसरे सरकार को भी संसद सदस्यों की भावना के अनुरूप बिल पेश करने हेतु मजबूर होना पडेगा । अन्यथा भीड में ये नेता व संसद सदस्य जनता को यह प्रदर्शित करते रहेगे कि हम जनता के साथ है और जब संसद मे वोटिंग की बारी आएगी तो पता चलेगा कि लोकपाल बिल पारित नहीं हो सका । इस प्रक्रिया से राजनेताओं के दोहरे चरित्र की पोल खुल जाएगी और जनता को भी ये पता चल सकेगा कि हमारे किस चुने हुए प्रतिनिधी ने जनता के साथ धोखा किया ।

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